मदिरा सवैया
(भगण 211×7)+2
शिक्षक दे नित ज्ञान अपार बटावत हे सब ध्यान धरौ।
ज्ञान सिखावत हे सत मारग रेंगव झूठ ल आप डरौ।
विश्व चले गुरु ज्ञान म जी सुविचार रखौ सत भाव भरौं।
ज्ञान ल दान करें गढ़थे गुरु देव सही परनाम करौ।।
मीठ मया समभाव रहे नित प्रेम सबो बगरावव जी।
द्वेष कभू झन राखव जी सत मारग ला अपनावव जी।
क्रोध बड़ा नुकसान करे सब धीर ल आदत डावव जी।
प्रेम रहे हिरदे म सदा समता रस के गुन गावव जी।।
काबर तेज चलावय वाहन बाढ़त हे खतरा जानव जी।
ट्रेफिक रूल ल तोड़य जेमन चोट लगे बड़ मानव जी।
देख हवे जिनगी अनमोल धियान धरौं समझावव जी।
धीर म खीर सुनौ सब मानुष होश म वाहन चलावव
Saturday, 25 April 2020
तातक छंद गीत
तातंक छंद गीत
देश प्रेम में कर्म करेंगे,सुंदर जग हो जाएगा,
अनुशासन के पालन से ही,नवपरिवर्तन आएगा।
द्वेष कपट का दूरभगाकर,मानवता को लाना है,
सत्य हृदय मे वास करे ये,नित्य हमें अपनाना है,
जब अनुशासित मानुष होगा,पाप पनप नही पाएगा,
देश प्रेम में कर्म करेगें,सुंदर जग हो जाएगा।
मातृ वंदना नित्य करें तो,मान बचेगा नारी का,
माँ बेटी औ बहन कहेगें,समझे मन अवतारी का,
नेक हदय का भाव रखेगें,तब मानव कहलाएगा
देश प्रेम में कर्म करेगें,सुंदर जग हो जाएगा।
अंतस मन से प्रण ये करलो,सारे भेद मिटाएगें,
निर्मलता को धारण करके,रिश्तें सभी निभाएगें,
नवपरिवर्तन करना हमको,मन में सोच समाएगा,
देश प्रेम में कर्म करेगें,सुंदर जग हो जाएगा।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
देश प्रेम में कर्म करेंगे,सुंदर जग हो जाएगा,
अनुशासन के पालन से ही,नवपरिवर्तन आएगा।
द्वेष कपट का दूरभगाकर,मानवता को लाना है,
सत्य हृदय मे वास करे ये,नित्य हमें अपनाना है,
जब अनुशासित मानुष होगा,पाप पनप नही पाएगा,
देश प्रेम में कर्म करेगें,सुंदर जग हो जाएगा।
मातृ वंदना नित्य करें तो,मान बचेगा नारी का,
माँ बेटी औ बहन कहेगें,समझे मन अवतारी का,
नेक हदय का भाव रखेगें,तब मानव कहलाएगा
देश प्रेम में कर्म करेगें,सुंदर जग हो जाएगा।
अंतस मन से प्रण ये करलो,सारे भेद मिटाएगें,
निर्मलता को धारण करके,रिश्तें सभी निभाएगें,
नवपरिवर्तन करना हमको,मन में सोच समाएगा,
देश प्रेम में कर्म करेगें,सुंदर जग हो जाएगा।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
रोला छंद-कोरोना
रोला छंद - श्रीमती आशा आजाद
कोरोना का रोग,देश में कैसा आया।
बीमारी का रूप,वायरस ये फैलाया।।
बिगड़ रहे हालात,नाश क्षण भर में करता।
लग जाये ये रोग,नित्य है मानुष मरता।।
फैलाया यह रोग,चीन ये देखो जानो।
खाते कच्चा मांस,रोग नव ये पहचानो।।
फैलै तुरंत अंग,हाथ न कभी मिलाना।
मास्क लगाओ रोज,ज्ञान की बात सिखाना।।
भीड़ भाड़ से दूर,मनुज पर होवें भारी,
जन जन फैला खूब,वायरस का बीमारी,
मुँह में रखें रुमाल,संक्रमण फैल न पाए,
बाहर अभी न जाय,स्पर्स से रोग लगाए।।
खाँसी संग जुकाम,जानलें यही निसानी,
गला करे जब जाम,जाँच है नित्य करानी
चमगादड़ औ सर्प,देख लो चीनी खाते,
बिगड़ रहा हालात,देखकर समझ न पाते।
शहर विदेश व गाँव,देश का कोना कोना।
तड़प रहे सब लोग,घातक बना कोरोना।।
धोयें अपने हाथ,रोज साबुन से अपने।
रखलें करलें ध्यान,रोग न पाये पनपने।।
ताजा खाना खाय,गरम पानी ही पीयें।
करलें निसदिन योग,शुद्ध भोजन से जीयें।।
करदो पूरा बंद,चीन का खाना पीना।
बिगड़े है हालात,त्यागकर अब है जीना।।
रोकथाम का काम,आज है डाक्टर करते,
मानें उनकी राय,जाँच से हम है बचते,
सर्दी छींक जुकाम,अगर बढ़ जाये सुनलो ,
तब करवाये जाँच,स्वस्थ तन खुद ही चुनलो ।
छंदकार - श्रीमती आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
अमृतध्वनि छंद
आशा की अमृत वाणी...✍️
अमृतध्वनि छंद
मजदूर
रोजी रोटी की ललक,मजदूरों का जंग,
रोज कमाते देख लो,जलता निसदिन अंग,
जलता निसदिन-अंग भूख से,सदा तड़पते,
कठिन परिश्रम,करते फिरभी,भूखें रहते,
आशा कहती,बात नही है,कोई छोटी,
दूर देश में,जाय कमाने,रोजी रोटी।
कड़ी तपन से देह पर,छाले पड़े हजार,
मजदूरी है कुछ नही,टूटा घर औ द्वार,
टूटा घर औ-द्वार नही है,राशन पानी,
आज देख लो,मजदूरों की,यही कहानी,
आशा कहती,नित्य सहे ये,भूख की अगन,
दिल रोता है,हाल देखकर,ये कड़ी तपन।
मोबाइल
मोबाइल के दौर में,चिट्ठी का क्या काम
क्षण भर में सब काम हो,ये ही चारों धाम,
ये ही चारो -धाम सभी को,इसकी इच्छा,
सभी चाहते,मोबाइल हो,मेरा अच्छा,
ढूँढ निकाले,क्षण भर में ये,कोई फाइल,
मात पिता औ,बच्चे रखते,है मोबाइल।।
बच्चे बूढ़े आज तो,दिनभर करते चेट
शहर गाँव चहुँओर अब,व्यस्त रहे है नेट
व्यस्त रहे है-नेट पैक सब,फुल भरवाते
शौचालय में,आज देखलो,लेकर जाते
आशा कहती,पढ़ने में अब,होते कच्चे
घर के अंदर,गेम खेलते,रहते बच्चे।।
वक्त बड़ा अनमोल है,पुत्र न समझें बात,
लोभ हृदय में रख चले,करते है वे घात,
करते है वे-घात रुलाते ,मात पिता को,
तरस रहे है,भूलें बेटे,अब ममता को,
आशा कहती,वृद्धावस्था,तन से अशक्त,
जिम्मेदारी,सदा निभाया,था वो वक्त।
माँ
द्वार खड़े राह तकूँ,मन में है विश्वास,
व्याकुल तेरे नाम से,अब तो आजा पास,
अब तो आजा-पास बहुत है, तुझसे आशा,
क्षण क्षण छूटे,श्वास हमारी,होय निराशा,
आयु नही है,धीर धरे जो,वक्त से लड़े,
छोड़ रही हूँ,आज श्वास सुन,मैं द्वार खड़े।
माँ की ममता रो रही,हरपल रहूँ अनंद,
जब आएगा द्वार में,ताला होगा बंद,
ताला होगा-बंद तुझे माँ,नही मिलेगी,
खुश रहे तू,हर क्षण माँ सुन,यही कहेगी,
क्या खोया है,रिश्तें मे तू ,होय गहनता,
एक बार ही,मिलता सुनले,माँ की ममता।।
शिक्षा के नव ज्योत से,नित्य करें उत्थान,
दीन दुखित को भी सदा,बाँटें सुंदर ज्ञान,
बाटे सुंदर,ज्ञान साथ की,जरुरत उनको,
आप झाँकिए,दीन दुखी के,निर्मल मन को,
आशा कहती,शिक्षित करदें,देवें दीक्षा,
पुण्य मिलेगा,दान करें सब,निर्मल शिक्षा।
शिक्षा
शिक्षा करे विकास है,सुंदर यह सौगात,
जीवन सरल सहज बने,ध्यान धरे ये बात,
ध्यान धरें ये,बात इसी से,हो उजियारा,
हल मिल जाता,दूर भगे है,सब अँधियारा,
आशा कहती,ईश्वर लेते,सदा परीक्षा,
कर्म करे जो,जनहित होवें,देकर शिक्षा।
आओ साजन पास अब,प्रीत बड़ा तड़पाय,
हृदय बड़ा व्याकुल हुआ,सावन बीता जाय,
सावन बीता,जाय बहुत है,याद सताती,
हृदय न समझे,रह-रह कर ये,मुझे रुलाती,
आशा कहती,प्रेम भरा मन,सँग में लाओ,
तड़प रही हूँ,तन्हा अब तो,साजन आओ।
साजन आओ
नैन बिछाएँ प्रेम में,आकर दो सौगात,
राह तके पथ को सदा,नीर बहे दिन रात,
नीर बहे दिन,रात जागती,सोचूँ हरपल,
सुखद मिलन की,आस हृदय को,कर रहा विकल,
आशा कहती,इस जगती में,कुछ नहिं भाएँ,
स्वप्न सँजोते,बैठी साजन,नैन बिछाएँ।
सखियों का वह शोर,अब न भाये सजना।
भूख प्यास सब त्याग,भूल गई मैं सँवरना।।
मुझको विरह सताय,सोच में निसदिन रहती।
अश्क बने अंगार,सनम आओ ये कहती।।
मेरी है यह दुर्दशा,हर क्षण जपती नाम हूँ।
आकर मुझको थाम लो,देती ये पैगाम हूँ।।
लापरवाही
लापरवाही देख लें,अनहोनी हो जाय।
सब बच्चों को आज तो,वाहन ही है भाय।।
वाहन ही है,भाय जोश में,तेज चलाते।
नियम बने जो,नित्य तोड़ते,मजे उड़ाते।।
आशा कहती,अपनाते है,तानाशाही।
घटती घटना,करते है जो,लापरवाही।।
जीवन तो अनमोल है,जीवन के दिन चार।
है जो यातायात के,पढ़ें नियम का सार।।
पढ़ें नियम का,सार सभी फिर,पालन करलें।
दुर्घटना से,सदा बचे सब,सोच समझ लें।।
आशा कहती,ध्यान धरें सब,छोड़े खीवन।
गाँठ बाँध ले,जीना हमको,उत्तम जीवन।।
रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
कोरबा छत्तीसगढ़
अमृतध्वनि छंद
मजदूर
रोजी रोटी की ललक,मजदूरों का जंग,
रोज कमाते देख लो,जलता निसदिन अंग,
जलता निसदिन-अंग भूख से,सदा तड़पते,
कठिन परिश्रम,करते फिरभी,भूखें रहते,
आशा कहती,बात नही है,कोई छोटी,
दूर देश में,जाय कमाने,रोजी रोटी।
कड़ी तपन से देह पर,छाले पड़े हजार,
मजदूरी है कुछ नही,टूटा घर औ द्वार,
टूटा घर औ-द्वार नही है,राशन पानी,
आज देख लो,मजदूरों की,यही कहानी,
आशा कहती,नित्य सहे ये,भूख की अगन,
दिल रोता है,हाल देखकर,ये कड़ी तपन।
मोबाइल
मोबाइल के दौर में,चिट्ठी का क्या काम
क्षण भर में सब काम हो,ये ही चारों धाम,
ये ही चारो -धाम सभी को,इसकी इच्छा,
सभी चाहते,मोबाइल हो,मेरा अच्छा,
ढूँढ निकाले,क्षण भर में ये,कोई फाइल,
मात पिता औ,बच्चे रखते,है मोबाइल।।
बच्चे बूढ़े आज तो,दिनभर करते चेट
शहर गाँव चहुँओर अब,व्यस्त रहे है नेट
व्यस्त रहे है-नेट पैक सब,फुल भरवाते
शौचालय में,आज देखलो,लेकर जाते
आशा कहती,पढ़ने में अब,होते कच्चे
घर के अंदर,गेम खेलते,रहते बच्चे।।
वक्त बड़ा अनमोल है,पुत्र न समझें बात,
लोभ हृदय में रख चले,करते है वे घात,
करते है वे-घात रुलाते ,मात पिता को,
तरस रहे है,भूलें बेटे,अब ममता को,
आशा कहती,वृद्धावस्था,तन से अशक्त,
जिम्मेदारी,सदा निभाया,था वो वक्त।
माँ
द्वार खड़े राह तकूँ,मन में है विश्वास,
व्याकुल तेरे नाम से,अब तो आजा पास,
अब तो आजा-पास बहुत है, तुझसे आशा,
क्षण क्षण छूटे,श्वास हमारी,होय निराशा,
आयु नही है,धीर धरे जो,वक्त से लड़े,
छोड़ रही हूँ,आज श्वास सुन,मैं द्वार खड़े।
माँ की ममता रो रही,हरपल रहूँ अनंद,
जब आएगा द्वार में,ताला होगा बंद,
ताला होगा-बंद तुझे माँ,नही मिलेगी,
खुश रहे तू,हर क्षण माँ सुन,यही कहेगी,
क्या खोया है,रिश्तें मे तू ,होय गहनता,
एक बार ही,मिलता सुनले,माँ की ममता।।
शिक्षा के नव ज्योत से,नित्य करें उत्थान,
दीन दुखित को भी सदा,बाँटें सुंदर ज्ञान,
बाटे सुंदर,ज्ञान साथ की,जरुरत उनको,
आप झाँकिए,दीन दुखी के,निर्मल मन को,
आशा कहती,शिक्षित करदें,देवें दीक्षा,
पुण्य मिलेगा,दान करें सब,निर्मल शिक्षा।
शिक्षा
शिक्षा करे विकास है,सुंदर यह सौगात,
जीवन सरल सहज बने,ध्यान धरे ये बात,
ध्यान धरें ये,बात इसी से,हो उजियारा,
हल मिल जाता,दूर भगे है,सब अँधियारा,
आशा कहती,ईश्वर लेते,सदा परीक्षा,
कर्म करे जो,जनहित होवें,देकर शिक्षा।
आओ साजन पास अब,प्रीत बड़ा तड़पाय,
हृदय बड़ा व्याकुल हुआ,सावन बीता जाय,
सावन बीता,जाय बहुत है,याद सताती,
हृदय न समझे,रह-रह कर ये,मुझे रुलाती,
आशा कहती,प्रेम भरा मन,सँग में लाओ,
तड़प रही हूँ,तन्हा अब तो,साजन आओ।
साजन आओ
नैन बिछाएँ प्रेम में,आकर दो सौगात,
राह तके पथ को सदा,नीर बहे दिन रात,
नीर बहे दिन,रात जागती,सोचूँ हरपल,
सुखद मिलन की,आस हृदय को,कर रहा विकल,
आशा कहती,इस जगती में,कुछ नहिं भाएँ,
स्वप्न सँजोते,बैठी साजन,नैन बिछाएँ।
सखियों का वह शोर,अब न भाये सजना।
भूख प्यास सब त्याग,भूल गई मैं सँवरना।।
मुझको विरह सताय,सोच में निसदिन रहती।
अश्क बने अंगार,सनम आओ ये कहती।।
मेरी है यह दुर्दशा,हर क्षण जपती नाम हूँ।
आकर मुझको थाम लो,देती ये पैगाम हूँ।।
लापरवाही
लापरवाही देख लें,अनहोनी हो जाय।
सब बच्चों को आज तो,वाहन ही है भाय।।
वाहन ही है,भाय जोश में,तेज चलाते।
नियम बने जो,नित्य तोड़ते,मजे उड़ाते।।
आशा कहती,अपनाते है,तानाशाही।
घटती घटना,करते है जो,लापरवाही।।
जीवन तो अनमोल है,जीवन के दिन चार।
है जो यातायात के,पढ़ें नियम का सार।।
पढ़ें नियम का,सार सभी फिर,पालन करलें।
दुर्घटना से,सदा बचे सब,सोच समझ लें।।
आशा कहती,ध्यान धरें सब,छोड़े खीवन।
गाँठ बाँध ले,जीना हमको,उत्तम जीवन।।
रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
कोरबा छत्तीसगढ़
Sunday, 19 April 2020
चौपाई छंद
चौपाई छंद-श्रीमती आशा आजाद
मेरा सुंदर गाँव निराला
मेरा सुंदर गाँव निराला।हर्षित मन को करने वाला।
शुद्ध हवा जो निसदिन आये।तन मन को सब शुद्ध बनाये।।
पंक्षी मधुरिम गीत सुनाते।चीं चीं करके हृदय लुभाते।
निर्मल वातावरण लुभाता।सेहत सबके मन को भाता।।
गोबर के कंडे से जानो।धुँआ मारता मच्छर मानो।
घर आँगन है मन को भाता।गोबर से जब है लिप जाता।।
नही प्रदूषण वहाँ सताता।मानुष सुंदर देह बनाता।
सदा मेहनतकश वो होता।बहुत भार वह निसदिन ढोता।।
नही शोरगुल नही लड़ाई।आपस में सब भाई भाई।
विपदा मिलकर दूर भगाते।प्रेम दीप का ज्योत जलाते।।
वहाँ आधार है बस खेती।जो हमको है जीवन देती।
अन्न उगाकर जीवन देते।संतुष्टी अपना है लेते।।
बीमारी का नही है रोना।नित्य मेहनत को समझे सोना।
वहाँ नही तन सेहत खोता।गाँव शहर से सुंदर होता।।
सुंदर ऐसा गाँव बनाना।जाने पर वह लगे सुहाना।
शुद्ध हवा का आना जाना।इससे सुंदर नही ठिकाना।।
छंदकार-श्रीमती आशा आजाद
पता मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
मेरा सुंदर गाँव निराला
मेरा सुंदर गाँव निराला।हर्षित मन को करने वाला।
शुद्ध हवा जो निसदिन आये।तन मन को सब शुद्ध बनाये।।
पंक्षी मधुरिम गीत सुनाते।चीं चीं करके हृदय लुभाते।
निर्मल वातावरण लुभाता।सेहत सबके मन को भाता।।
गोबर के कंडे से जानो।धुँआ मारता मच्छर मानो।
घर आँगन है मन को भाता।गोबर से जब है लिप जाता।।
नही प्रदूषण वहाँ सताता।मानुष सुंदर देह बनाता।
सदा मेहनतकश वो होता।बहुत भार वह निसदिन ढोता।।
नही शोरगुल नही लड़ाई।आपस में सब भाई भाई।
विपदा मिलकर दूर भगाते।प्रेम दीप का ज्योत जलाते।।
वहाँ आधार है बस खेती।जो हमको है जीवन देती।
अन्न उगाकर जीवन देते।संतुष्टी अपना है लेते।।
बीमारी का नही है रोना।नित्य मेहनत को समझे सोना।
वहाँ नही तन सेहत खोता।गाँव शहर से सुंदर होता।।
सुंदर ऐसा गाँव बनाना।जाने पर वह लगे सुहाना।
शुद्ध हवा का आना जाना।इससे सुंदर नही ठिकाना।।
छंदकार-श्रीमती आशा आजाद
पता मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
गीत
पुलकित है मेरे नैन सलोने, मन बिछा रंगोली रे,
मैं तो भीगी पिया जी के रंग,खूब खेलूँ होली रे।।
मैं कुछ इतराऊँ कुछ बलखाऊँ,नैन जब टकराये जी,
आएँ मुख पर जब गुलाल मलने,मन बहुत शर्माये जी,
लगता जैसै सारी ये खुशियाँ,आज भरती झोली रे,
पुलकित है मेरे नैन सलोने,मन बिछा रंगोली रे।
इस होली की है बात निराली,मन आज सुंदर लागे है,
जहाँ भागते है पिय मस्ती में,मन मधुर ये भागे है,
हृदय भाव पुलकित मुस्काता,मन प्रेम की रोली रे,
पुलकित है मेरे नैन सलोने, मन बिछा रंगोली रे।
साजन मुझको आज रंग दो जी,प्रेम अगाड़ गहरा हो,
तेरे नाम के सभी रंग गुलाल हो,मन रंग का पहरा हो,
नित्य घेरकर चिढ़ा रही सखियाँ,छेड़ते है हमजोली रे,
पुलकित है मेरे नैन सलोने, मन बिछा रंगोली रे।
रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
राधेश्यामी /आधार छंद गीत
राधेश्यामी छंद-16-16
संबंधों के बंध न छूटे,आओ कुछ पल संवाद करें,
बात न भाये हृदय भाव को,कुछ भूल चले कुछ याद करें।
मृदुवाणी भी काम न आये,मन में जब हो आक्रोश भरा,
होश गँवाकर संवाद करे जो,सुलझे कैसै जब जोश धरा,
साथ अगर चलना हो सबके,सब्र रखें नही अतिवाद करें,
संबंधों के बंध न छूटे,आओ कुछ पल संवाद करें।
संयम जीवन में उपयोगी,सब अंर्तमन नित्य धीर धरें,
प्रेम भाव से संबंध बनाये,क्रोध जोश है गंभीर डरें,
निभ जाते है बंधन सारे,सदा सत्य की बुनियाद करें,
संबंधों के बंध न छूटे,आओ कुछ पल संवाद करें।
अहम् भाव की जगह न होती,जो संबंधो के मध्य रहे,
मित्रगणों का साथ अगर हो,विश्वास धरें मन सत्य कहे,
आशाएँ जो बाँधी हमने,उस बंधन का प्रतिनाद करे,
संबंधों के बंध न छूटे,आओ कुछ पल संवाद करें।
रचनाकार -श्रीमती आशा आजाद
कोरबा छत्तीसगढ़
सरसी छंद गीत
सरसी छंद गीत
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
अंतर के पट खोल तभी तो,मन होवे उजियार।।
कर्म करे जो मन को भाये,मृदु वाणी रस घोल,
सत्य वचन को हृदय बसाये,कर्म का समझे मोल,
क्षणिक समय में पुण्य काज हो,जन्में ये सुविचार,
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
मन में कभी न द्वेष समाये,ऐसा करलें कर्म,
दीन दुखी की सेवा करना,बनें हमारा धर्म,
अन्नदान की राह में चलना,बने यही संस्कार,
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
है अनाथ जो जीवन जीते,उनका हो उद्धार,
पालन पोषण शिक्षित करके,दें सुंदर व्यवहार,
इस धरा पर मानुष ही है,शुभ वर के करतार,
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
दिव्यांगों को मार्ग दिखाना,उनका देवें साथ,
कदम मिलाकर हिम्मत बाँधे,सदा बढ़ायें हाथ,
सकल जगत में नेकी गूँजे,बनके नव झनकार,
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
कोरबा छतीसगढ़
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
अंतर के पट खोल तभी तो,मन होवे उजियार।।
कर्म करे जो मन को भाये,मृदु वाणी रस घोल,
सत्य वचन को हृदय बसाये,कर्म का समझे मोल,
क्षणिक समय में पुण्य काज हो,जन्में ये सुविचार,
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
मन में कभी न द्वेष समाये,ऐसा करलें कर्म,
दीन दुखी की सेवा करना,बनें हमारा धर्म,
अन्नदान की राह में चलना,बने यही संस्कार,
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
है अनाथ जो जीवन जीते,उनका हो उद्धार,
पालन पोषण शिक्षित करके,दें सुंदर व्यवहार,
इस धरा पर मानुष ही है,शुभ वर के करतार,
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
दिव्यांगों को मार्ग दिखाना,उनका देवें साथ,
कदम मिलाकर हिम्मत बाँधे,सदा बढ़ायें हाथ,
सकल जगत में नेकी गूँजे,बनके नव झनकार,
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
कोरबा छतीसगढ़
तातंक छंद गीत
तातंक छंद गीत
देश प्रेम में कर्म करेंगे,सुंदर जग हो जाएगा,
अनुशासन के पालन से ही,नवपरिवर्तन आएगा।
द्वेष कपट का दूरभगाकर,मानवता को लाना है,
सत्य हृदय मे वास करे ये,नित्य हमें अपनाना है,
जब अनुशासित मानुष होगा,पाप पनप नही पाएगा,
देश प्रेम में कर्म करेगें,सुंदर जग हो जाएगा।
मातृ वंदना नित्य करें तो,मान बचेगा नारी का,
माँ बेटी औ बहन कहेगें,समझे मन अवतारी का,
नेक हदय का भाव रखेगें,तब मानव कहलाएगा
देश प्रेम में कर्म करेगें,सुंदर जग हो जाएगा।
अंतस मन से प्रण ये करलो,सारे भेद मिटाएगें,
निर्मलता को धारण करके,रिश्तें सभी निभाएगें,
नवपरिवर्तन करना हमको,मन में सोच समाएगा,
देश प्रेम में कर्म करेगें,सुंदर जग हो जाएगा।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
देश प्रेम में कर्म करेंगे,सुंदर जग हो जाएगा,
अनुशासन के पालन से ही,नवपरिवर्तन आएगा।
द्वेष कपट का दूरभगाकर,मानवता को लाना है,
सत्य हृदय मे वास करे ये,नित्य हमें अपनाना है,
जब अनुशासित मानुष होगा,पाप पनप नही पाएगा,
देश प्रेम में कर्म करेगें,सुंदर जग हो जाएगा।
मातृ वंदना नित्य करें तो,मान बचेगा नारी का,
माँ बेटी औ बहन कहेगें,समझे मन अवतारी का,
नेक हदय का भाव रखेगें,तब मानव कहलाएगा
देश प्रेम में कर्म करेगें,सुंदर जग हो जाएगा।
अंतस मन से प्रण ये करलो,सारे भेद मिटाएगें,
निर्मलता को धारण करके,रिश्तें सभी निभाएगें,
नवपरिवर्तन करना हमको,मन में सोच समाएगा,
देश प्रेम में कर्म करेगें,सुंदर जग हो जाएगा।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
छप्पय छंद
छप्पय छंद - श्रीमती आशा आजाद
प्रीत बड़ा तड़पाय,हृदय व्याकुल है मेरा।
तकती हूँ मै राह,रात से हुआ सवेंरा।।
इन नैनों को आस,नीर है झर झर बहते।
तुम दोगे आवाज,राह को हरदम तकते।
मेरे मन की यह व्यथा,सुनते सारे लोग है।
दीवानी सी फिर रही,दर्द भरा ये रोग है।।
सखियों का वह शोर,अब न भाये सजना।
भूख प्यास सब त्याग,भूल गई मैं सँवरना।।
मुझको विरह सताय,सोच में निसदिन रहती।
अश्क बने अंगार,सनम आओ ये कहती।।
मेरी है यह दुर्दशा,हर क्षण जपती नाम हूँ।
आकर मुझको थाम लो,देती ये पैगाम हूँ।।
प्रीत बड़ा तड़पाय,हृदय व्याकुल है मेरा।
तकती हूँ मै राह,रात से हुआ सवेंरा।।
इन नैनों को आस,नीर है झर झर बहते।
तुम दोगे आवाज,राह को हरदम तकते।
मेरे मन की यह व्यथा,सुनते सारे लोग है।
दीवानी सी फिर रही,दर्द भरा ये रोग है।।
सखियों का वह शोर,अब न भाये सजना।
भूख प्यास सब त्याग,भूल गई मैं सँवरना।।
मुझको विरह सताय,सोच में निसदिन रहती।
अश्क बने अंगार,सनम आओ ये कहती।।
मेरी है यह दुर्दशा,हर क्षण जपती नाम हूँ।
आकर मुझको थाम लो,देती ये पैगाम हूँ।।
सरसी छंद गीत
सरसी छंद गीत-श्रीमति आशा आजाद
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।
भूले से भी कभी न बिगड़े,धरती का श्रृंगार।।
छिपा हुआ भूगर्भ सहत पर,भूजल का भंडार।
शुद्ध रुप में बहे निरंतर,इससे ही संसार।
व्यर्थ कभी मत सुनो गँवाना,सुनो नीर उपहार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
खनिज संपदा बहुत धरा पर,वंसुधरा की शान।
मानव जीवन पर लोहा का,बहुत बड़ा है स्थान।
जितना हो जरुरत बस निकले,कहे धरा यह सार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।
आज कोयला गर्भ धरा से,खूब निकाले खान।
धरा नष्ट हो रही निरंतर,होय भूस्खलन जान।
रिक्त जगह को भरते जाएँ,तब होगा उद्धार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
वृक्ष न काटे खूब लगाये,समझें इसका मोल।
मानसून है इसपर निर्भर,मानव आँखें खोल।
पौधारोपण करें सभी जन,स्वस्थ देह का द्वार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
वन्य जीव व्याकुल है कितने,कितने वे बेचैन।
कटते जंगल लोभ मोह में,छिनता उनका रैन।
यहाँ वहाँ भटकने ना दे,होवें न निराधार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
गीतकार-श्रीमती आशा आजाद
पता मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।
भूले से भी कभी न बिगड़े,धरती का श्रृंगार।।
छिपा हुआ भूगर्भ सहत पर,भूजल का भंडार।
शुद्ध रुप में बहे निरंतर,इससे ही संसार।
व्यर्थ कभी मत सुनो गँवाना,सुनो नीर उपहार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
खनिज संपदा बहुत धरा पर,वंसुधरा की शान।
मानव जीवन पर लोहा का,बहुत बड़ा है स्थान।
जितना हो जरुरत बस निकले,कहे धरा यह सार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।
आज कोयला गर्भ धरा से,खूब निकाले खान।
धरा नष्ट हो रही निरंतर,होय भूस्खलन जान।
रिक्त जगह को भरते जाएँ,तब होगा उद्धार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
वृक्ष न काटे खूब लगाये,समझें इसका मोल।
मानसून है इसपर निर्भर,मानव आँखें खोल।
पौधारोपण करें सभी जन,स्वस्थ देह का द्वार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
वन्य जीव व्याकुल है कितने,कितने वे बेचैन।
कटते जंगल लोभ मोह में,छिनता उनका रैन।
यहाँ वहाँ भटकने ना दे,होवें न निराधार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
गीतकार-श्रीमती आशा आजाद
पता मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
मनहरण घनाक्षरी छंद
विषय -चित्राधारित लेखन
मनहरण घनाक्षरी
*नारी की पीड़ा न जाने,मान को न पहचाने,*
*अनाचार खूब करें,कैसा अपमान है।*
*माँ की कद्र भूले सभी,बहन न माना कभी,*
*मर्यादा समझे नही,पापी इंसान है।*
*कहाँ जाये आज नारी,घेरे उसे अत्याचारी,*
*तड़प तड़प देती,अपनी वो जान है।*
*अस्मत कैसै बचायें, विश्वास कहाँ पायें,*
*मानुष होते पाप को,देख अनजान है।*
*कुंठित मानसिकता,लूटते नित्य अस्मिता,*
*मानवता कलंकित ,होता अत्याचार है।*
*नारी की ये दुख व्यथा,सुधारे सारी व्यवस्था,*
*नारी पढ़ लिख के भी,कितनी लाचार है।*
*घिनौने कृत्य क्यों करें,हृदय सम्मान भरें,*
*मान ही तो नारी का ये,श्रेष्ठ उपहार है।*
*कलुषित मत करो,मानवता नित्य धरो,*
*माँ बेटी बहन होती,रिश्ता ये स्वीकार ले।*
आशा आजाद...✍️
मनहरण घनाक्षरी
*नारी की पीड़ा न जाने,मान को न पहचाने,*
*अनाचार खूब करें,कैसा अपमान है।*
*माँ की कद्र भूले सभी,बहन न माना कभी,*
*मर्यादा समझे नही,पापी इंसान है।*
*कहाँ जाये आज नारी,घेरे उसे अत्याचारी,*
*तड़प तड़प देती,अपनी वो जान है।*
*अस्मत कैसै बचायें, विश्वास कहाँ पायें,*
*मानुष होते पाप को,देख अनजान है।*
*कुंठित मानसिकता,लूटते नित्य अस्मिता,*
*मानवता कलंकित ,होता अत्याचार है।*
*नारी की ये दुख व्यथा,सुधारे सारी व्यवस्था,*
*नारी पढ़ लिख के भी,कितनी लाचार है।*
*घिनौने कृत्य क्यों करें,हृदय सम्मान भरें,*
*मान ही तो नारी का ये,श्रेष्ठ उपहार है।*
*कलुषित मत करो,मानवता नित्य धरो,*
*माँ बेटी बहन होती,रिश्ता ये स्वीकार ले।*
आशा आजाद...✍️
गीत 16-10
शंकर छंद गीत-16-10
असमंजस के बीच भँवर में,है घिरा इंसान।
कलुषित करता मानवता को,बन रहा हैवान।
लोभ मोह की लालच रखकर,भूलता सब कर्म।
बना रहा वर्चस्व झूठ पर,त्यागता सब धर्म।
भाई का दुश्मन भाई है,व्यर्थ करता सान।
असमंजस के बीच भँवर में,है घिरा इंसान।
सत्य पथ का त्याग है करतेछल कपट से वार।
दीन दुखी की दुखित व्यथा पर,घात बारंबार।
वर्तमान कलुषित करता है,झूठ पर अभिमान।
असमंजस के बीच भँवर में,है घिरा इंसान।
अस्मिता कहाँ है नारी की,है आज ये प्रश्न।
लुटती बाला न्याय माँगती,पाप करता जश्न।
कलयुग में नारी की रक्षा,कुछ रखे संज्ञान।
असमंजस के बीच भँवर में,है घिरा इंसान।
रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
असमंजस के बीच भँवर में,है घिरा इंसान।
कलुषित करता मानवता को,बन रहा हैवान।
लोभ मोह की लालच रखकर,भूलता सब कर्म।
बना रहा वर्चस्व झूठ पर,त्यागता सब धर्म।
भाई का दुश्मन भाई है,व्यर्थ करता सान।
असमंजस के बीच भँवर में,है घिरा इंसान।
सत्य पथ का त्याग है करतेछल कपट से वार।
दीन दुखी की दुखित व्यथा पर,घात बारंबार।
वर्तमान कलुषित करता है,झूठ पर अभिमान।
असमंजस के बीच भँवर में,है घिरा इंसान।
अस्मिता कहाँ है नारी की,है आज ये प्रश्न।
लुटती बाला न्याय माँगती,पाप करता जश्न।
कलयुग में नारी की रक्षा,कुछ रखे संज्ञान।
असमंजस के बीच भँवर में,है घिरा इंसान।
रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
तातंक छंद गीत
तातंक छंद गीत
समझो सच्ची दीवाली।
मानवता का भाव जगेगा,
हृदय नही होगा खाली।
दीन दुखी की सेवा करते ,
समझो मन उनका सच्चा ।
लोभ मोह में फँसा रहे जो,
उसका मन जानो कच्चा।।
प्रति पल मानुष हँसकर बैठै,
प्रेम भाव की हो डाली।
जिस दिन अंतः तमस मिटेगा,
समझो सच्ची दीवाली।
फुलझड़ियाँ सा रौशन करदें ,
समता जग में फैलाये।
मीठे पकवानों सा रसमय ,
मधुर गीत गढ़ के गायें।।
भेदभाव का बंधन टूटे ,
द्वेष हृदय से हो खाली।
जिस दिन अंतः तमस मिटेगा
समझो सच्ची दीवाली।
हृदय झूठ को आने मत दे ,
सत्यसंध बन जाओगे ।
नष्ट कपट की कोठरिया कर ,
उज्ज्वलता को पाओगे ।।
पाप बसा जब मन में अपने ,
मान बढ़ाना है जाली।
जिस दिन अंतः तमस मिटेगा,
समझो सच्ची दीवाली।।
Saturday, 18 April 2020
कुकुभ छंद
कुकुभ छंद छंद - श्रीमती आशा आजाद
आज जयंती बाबा का है,एकसाथ मिलकर मानें,
संविधान के निर्माता है,गुण को उनके पहचानें।
चलो मनायें जन्मदिवस को,शुभ दिन देखो आया है।
भीम रंग में डूबे हुए है,दिन ये कितना भाया है।
भेदभाव को सभी मिटाके,संविधान लिख छोड़े है,
सकल जगत में मान देखलो,जात पात सब तोड़े है।
शिक्षा का नव अलख जगाके,किया देश में उजियारा,
देखो छूआछूत भगाके,दूर किया सब अँधियारा।
दीन हीन शोषित मानुष को,सब अधिकार बताएँ है,
दलित जाति का हीरा बेटा,शिक्षा का अलख जगाएँ है।
ज्ञानी सबसे बढ़कर बाबा,पढ़ लिख जाओ सिखलाया,
स्वाभिमान के खातिर लड़ना,हक को अपने बतलाया।
याद रखें बाबा की वाणी,समता रखकर बढ़ जाओ।
राह संघर्ष का बस होवें,कर्म करो मंजिल पाओ।।
बाबा की कुर्बानी ऐसी, सुंदर आज हमारा है।
शिक्षित होकर रौशन करना,फर्ज यही तुम्हारा है।।।
प्रेम भाव समरसता बरसे,शिक्षित बनो सिखाया है।
स्वयं अकेला कठिन राह पर,पथ सुंदर दिखाया है।।
ऊपर लाकर जात पात से,नेक कर्म को सब जानो ।
भेदभाव से मुक्त कराया,गुण को उनके सब मानो।।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
कोरबा छत्तीसगढ़
आज जयंती बाबा का है,एकसाथ मिलकर मानें,
संविधान के निर्माता है,गुण को उनके पहचानें।
चलो मनायें जन्मदिवस को,शुभ दिन देखो आया है।
भीम रंग में डूबे हुए है,दिन ये कितना भाया है।
भेदभाव को सभी मिटाके,संविधान लिख छोड़े है,
सकल जगत में मान देखलो,जात पात सब तोड़े है।
शिक्षा का नव अलख जगाके,किया देश में उजियारा,
देखो छूआछूत भगाके,दूर किया सब अँधियारा।
दीन हीन शोषित मानुष को,सब अधिकार बताएँ है,
दलित जाति का हीरा बेटा,शिक्षा का अलख जगाएँ है।
ज्ञानी सबसे बढ़कर बाबा,पढ़ लिख जाओ सिखलाया,
स्वाभिमान के खातिर लड़ना,हक को अपने बतलाया।
याद रखें बाबा की वाणी,समता रखकर बढ़ जाओ।
राह संघर्ष का बस होवें,कर्म करो मंजिल पाओ।।
बाबा की कुर्बानी ऐसी, सुंदर आज हमारा है।
शिक्षित होकर रौशन करना,फर्ज यही तुम्हारा है।।।
प्रेम भाव समरसता बरसे,शिक्षित बनो सिखाया है।
स्वयं अकेला कठिन राह पर,पथ सुंदर दिखाया है।।
ऊपर लाकर जात पात से,नेक कर्म को सब जानो ।
भेदभाव से मुक्त कराया,गुण को उनके सब मानो।।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
कोरबा छत्तीसगढ़
अमृतध्वनि छंद
आशा की अमृत वाणी...✍️
अमृतध्वनि छंद
लापरवाही देख लें,घटना होते जाय।
सब बच्चों को आज तो,वाहन ही है भाय।।
वाहन ही है,भाय जोश में,तेज चलाते।
नियम बने जो,नित्य तोड़ते,मजे उड़ाते।।
आशा कहती,अपनाते है,तानाशाही।
अनहोनी घट,जाती सब है,लापरवाही।।
जीवन तो अनमोल है,जीवन के दिन चार।
है जो यातायात के,पढ़ें नियम का सार।।
पढ़ें नियम का,सार सभी फिर,पालन करलें।
दुर्घटना से,सदा बचे सब,सोच समझ लें।।
आशा कहती,ध्यान धरें सब,छोड़े खीवन।
गाँठ बाँध ले,जीना हमको,उत्तम जीवन।।
जल की कीमत जान लें,रखलें सदा सहेज।
नित्य तड़पते जल बिना,पुण्य कमाये भेज।।
पुण्य कमाये,भेज उन्हें जो,दीन दुखी है।
बड़े दूर से,पानी लाते,नही सुखी है।।
आशा वाणी,ये कहती है,जल दें हर पल।
व्यर्थ न होवें,कभी किसी के,हाथों से जल।।
निश्छल ममता माँ करे,ये जीवन आधार।
निर्मल मन से बाँटती,हृदय भाव से प्यार।
हृदय भाव से,प्यार बाँटकर,कर्म निभाती।
दुख सुख सहकर,कष्ट उठाकर,फर्ज सिखाती।
आशा वाणी,ये कहती है,रखती समता।
देवी मूरत,बसे अंर्तमन,निश्छल ममता।।
इस धरती में देव है,सारे नेक किसान।
भूख मिटे सब मनुज का,बोतें है वो धान।
बोतें है वो,धान अन्न जो,निसदिन खाते।
कठिन तपन को,नित्य सहें वो,कष्ट उठाते।
आशा वाणी,ये कहती है,इस जगती में।
यही भगवान,भूख मिटाते,इस धरती में।।
वाणी सुंदर नेक हो,कहते ये अनमोल।
सोच समझ के प्रेम से,बोलें मीठें बोल।
बोलें मीठे,बोल हृदय को,सुंदर भाता।
द्वेष कपट हो,दुश्मन भी हो,गले लगाता।
आशा वाणी,ये कहती है,अपने अंदर।
निर्मल पावन,जनहित बोलें,वाणी सुंदर।।
सदा अहम् की हार है,ऐसा दें संदेश।
प्रेम भाव अपनत्व से,मन का मिटता क्लेश।
मन का मिटता,क्लेश हृदय को,सुंदर रखता।
हो उदार जो,करुणा रखता,वो ही बढ़ता।
आशा वाणी,ये कहती हे,कर्म सर्वदा।
ध्यान धरें सब,काम बिगाड़े,ये अहम् सदा।।
इस धरती में देव है,सारे नेक किसान।
भूख मिटे सब मनुज का,उपजाते है धान।
उपजाते है,धान अन्न जो,निसदिन खाते।
कठिन तपन को,नित्य सहें वो,कष्ट उठाते।
आशा वाणी,ये कहती है,इस जगती में।
परम भगवान,भूख मिटाते,इस धरती में।।
वाणी सुंदर नेक हो,सबसे ये अनमोल।
सोच समझ के प्रेम से,बोलें मीठें बोल।
बोलें मीठे,बोल हृदय जो,सुंदर भाये।
द्वेष कपट हो,दुश्मन भी हो,गले लगाये।
आशा वाणी,ये कहती है,मन के अंदर।
निर्मल पावन,जनहित बोलें,वाणी सुंदर।।
नेक सृजन का सार हो,जग का हो उद्धार।
सुंदर नव पथ मार्ग पर,चले कलम की धार।।
चले कलम की-धार करे जो,नव उजियारा।
सुंदर कविता,गढ़ दें ऐसा,लागे न्यारा।।
आशा वाणी,ये कहती है,खुश हो जन मन।
कलम उठाकर,कवि सब रचदें,नव नेक सृजन।।
सदा अहम् की हार है,ऐसा दें संदेश।
प्रेम भाव अपनत्व से,मन का मिटता क्लेश।
मन का मिटता,क्लेश हृदय को,सुंदर रखता।
हो उदार जो,करुणा रखता,वो ही बढ़ता।
आशा वाणी,ये कहती हे,कर्म सर्वदा।
ध्यान धरें सब,काम बिगाड़े,ये अहम् सदा।
पारस होती बेटियाँ,इनसे घर संसार,
विश्व धरा की सार है,बाँटे निश्छल प्यार,
बाँटे निश्छल,प्यार सभी को,बाँधे रखती,
रिश्ते नाते,सदा निभाती,दुख सब सहती,
आशा वाणी,ये कहती है,देती साहस,
सदा रही है,सदा रहेगी,बेटी पारस।
शिक्षक तो वरदान है,धरती के अभिमान,
दिव्य ज्योत भंडार से,बाँटे निसदिन ज्ञान,
बाँटे निसदिन,ज्ञान दीप को,हृदय जलाते,
जिनगी गढ़ते,अँधकार को,दूर भगाते,
आशा वाणी,ये कहती है,सच्चा दीक्षक,
इस धरती पर,परम पूज्य है,सारे शिक्षक।।
लक्ष्य हमारा श्रेष्ठ हो,सुंदर हो सब राह,
जनहित अपना कर्म हो,जीवन की हो चाह,
जीवन की हो,चाह बने हम,कर्मठ ज्ञानी,
रोते जन को,सदा हँसाये,बनकर दानी,
आशा वाणी,ये कहती है,बने सहारा,
कष्ट मिटाना,एकमात्र हो,लक्ष्य हमारा।
बहुत बड़ी है आपदा,लाये प्रलय विशाल।
पल भर में सब खत्म हो,लाये सबका काल।
लाये सबका,काल सुनो जल,से भी खतरा।
घर न बनाये,समुद्र होवे,ज्यादा गहरा।
आशा वाणी,ये कहती है,दुखद घड़ी है।
बहकर मरते,यह विपदा भी,बहुत बड़ी है।
लक्ष्य हमारा श्रेष्ठ हो,सुंदर हो सब राह,
जनहित अपना कर्म हो,जीवन की हो चाह,
जीवन की हो,चाह बने हम,कर्मठ ज्ञानी,
रोते जन को,सदा हँसाये,बनकर दानी,
आशा वाणी,ये कहती है,बने सहारा,
कष्ट मिटाना,एकमात्र हो,लक्ष्य हमारा।
बहुत बड़ी है आपदा,जल का प्रलय विशाल।
पल भर में सब खत्म हो,लाये सबका काल।
लाये सबका,काल सुनो जल,से भी खतरा।
घर न बनाये,समुद्र होवे,ज्यादा गहरा।
आशा वाणी,ये कहती है,दुखद घड़ी है।
बहकर मरते,यह विपदा भी,बहुत बड़ी है।।
सदा योग से लाभ है,कहते है सब संत,
भोर भये शुभ काल में,बीमारी का अंत,
बीमारी का,अंत हृदय को,निर्मल रखता,
शुद्ध श्वास दे,रक्त तंत्र में,निसदिन बढ़ता,
आशा वाणी,ये कहती है,बहुत फायदा,
गुणकारी है,सेहत देती,यह योग सदा।
आडंबर में क्या धरा,धन का क्यों हो लोभ,
जब बिगड़े है काज तो,अनुभव होता क्षोभ,
अनुभव होता,क्षोभ तभी जब,काल बुलाता,
व्यर्थ किया था,लोभ सोचकर,प्राण गँवाता,
आशा वाणी,ये कहती है,मन अंतर में,
संयम रखलें,क्यों जीना है,आडंबर में।
वसुंधरा पर बेटियाँ,अनुपम है सौगात,
भ्रूण नाश अपराध है,ध्यान धरें ये बात,
ध्यान धरें ये,बात मान लें,पाप न करना,
भ्रूण नाश के,बुरे कृत्य से,हरपल बचना,
आशा कहती,व्यर्थ दिखावा,परंपरा पर,
बेटी है जो,अवतारी है,वसुंधरा पर।।
निर्धन जन के पीर को,देख बढ़ाये हाथ,
दुख पीड़ा में जल रहे,उनका दें दें साथ,
उनका दें दें,साथ अगर हम,सक्षम धन से,
अन्न दान कर,पुस्तक कापी,बाँटें मन से,
आशा कहती,धर्म निभाये,कर अभिवर्धन,
ज्ञान दान कर,बने सहारा,है जो निर्धन।
पुलिस प्रशासन को नमन,अंतस से सम्मान,
नित्य सुरक्षा दे रहे ,यही देश की शान,
यही देश की,शान फर्ज है,सदा निभाते,
कोरोना ये,हो न संक्रमित,ये सिखलाते,
आशा कहती,दीन दुखी को,देते राशन,
जन सेवा को,सदा निभातें,पुलिस प्रशासन।।
पुलिस सुरक्षा दे रही,फैली है चहुँओर,
अनुशासन के रोक पर,खड़ी रहे हर छोर,
खड़ी रहे हर,छोर रखें है,सब निगरानी,
डंडे पड़ते ,रोज करे है,जो मनमानी,
आशा कहती,करे न इनकी,कभी उपेक्षा,
तन मन देकर,हरपल करते,पुलिस सुरक्षा।
पानी जितना हो सके,घर पर खूब बचाय,
प्यासे को पानी मिले,ऐसा कुछ कर जाय,
ऐसा कुछ कर,जाय बचत की,राह बताएँ,
व्यर्थ गँवाते,है जन सबको,बचत कराएँ,
आशा कहती,ध्यान धरें औ,होवें ज्ञानी,
नित्य धरा पर,आज देखलो,घटता पानी।
पानी के इस मोल को,जन-जन समझे आज,
भोर भये माँगे सभी,होवे इससे काज,
होवे इससे,काज सभी को,यही समझना,
व्यर्थ गँवाकर,बाद पड़ेगा,खूब तरसना,
आशा कहती,कभी न करना,ये मनमानी,
जीवन देती,अमृत सदा से,होता पानी।
रक्त दान तो पुण्य है,नेकी का है कर्म,
सदा निभायें प्रेम से,मानवता का धर्म,
मानवता का,धर्म नेक जो,जीव बचाएँ,
पुण्य कमाले,रक्तदान की,सोच बनाएँ,
आशा कहती,पीड़ा देख न,बने अंजान,
जनहित में सब,सदा करावें,सब रक्त दान।
रक्त नित्य बनता सुनो,रखलो यह संज्ञान,
लाल रक्त के कण सभी,रक्त तंत्र में मान,
रक्त तंत्र में ,मान इसी से ,सेहत बनता,
डरे नही यह,बात समझलें,कभी न घटता,
आशा कहती,पौस्टिक खावें,सब रहे मस्त,
नित्य निरंतर,तन पर अपने,है बढ़े रक्त।।
अमृतध्वनि छंद
लापरवाही देख लें,घटना होते जाय।
सब बच्चों को आज तो,वाहन ही है भाय।।
वाहन ही है,भाय जोश में,तेज चलाते।
नियम बने जो,नित्य तोड़ते,मजे उड़ाते।।
आशा कहती,अपनाते है,तानाशाही।
अनहोनी घट,जाती सब है,लापरवाही।।
जीवन तो अनमोल है,जीवन के दिन चार।
है जो यातायात के,पढ़ें नियम का सार।।
पढ़ें नियम का,सार सभी फिर,पालन करलें।
दुर्घटना से,सदा बचे सब,सोच समझ लें।।
आशा कहती,ध्यान धरें सब,छोड़े खीवन।
गाँठ बाँध ले,जीना हमको,उत्तम जीवन।।
जल की कीमत जान लें,रखलें सदा सहेज।
नित्य तड़पते जल बिना,पुण्य कमाये भेज।।
पुण्य कमाये,भेज उन्हें जो,दीन दुखी है।
बड़े दूर से,पानी लाते,नही सुखी है।।
आशा वाणी,ये कहती है,जल दें हर पल।
व्यर्थ न होवें,कभी किसी के,हाथों से जल।।
निश्छल ममता माँ करे,ये जीवन आधार।
निर्मल मन से बाँटती,हृदय भाव से प्यार।
हृदय भाव से,प्यार बाँटकर,कर्म निभाती।
दुख सुख सहकर,कष्ट उठाकर,फर्ज सिखाती।
आशा वाणी,ये कहती है,रखती समता।
देवी मूरत,बसे अंर्तमन,निश्छल ममता।।
इस धरती में देव है,सारे नेक किसान।
भूख मिटे सब मनुज का,बोतें है वो धान।
बोतें है वो,धान अन्न जो,निसदिन खाते।
कठिन तपन को,नित्य सहें वो,कष्ट उठाते।
आशा वाणी,ये कहती है,इस जगती में।
यही भगवान,भूख मिटाते,इस धरती में।।
वाणी सुंदर नेक हो,कहते ये अनमोल।
सोच समझ के प्रेम से,बोलें मीठें बोल।
बोलें मीठे,बोल हृदय को,सुंदर भाता।
द्वेष कपट हो,दुश्मन भी हो,गले लगाता।
आशा वाणी,ये कहती है,अपने अंदर।
निर्मल पावन,जनहित बोलें,वाणी सुंदर।।
सदा अहम् की हार है,ऐसा दें संदेश।
प्रेम भाव अपनत्व से,मन का मिटता क्लेश।
मन का मिटता,क्लेश हृदय को,सुंदर रखता।
हो उदार जो,करुणा रखता,वो ही बढ़ता।
आशा वाणी,ये कहती हे,कर्म सर्वदा।
ध्यान धरें सब,काम बिगाड़े,ये अहम् सदा।।
इस धरती में देव है,सारे नेक किसान।
भूख मिटे सब मनुज का,उपजाते है धान।
उपजाते है,धान अन्न जो,निसदिन खाते।
कठिन तपन को,नित्य सहें वो,कष्ट उठाते।
आशा वाणी,ये कहती है,इस जगती में।
परम भगवान,भूख मिटाते,इस धरती में।।
वाणी सुंदर नेक हो,सबसे ये अनमोल।
सोच समझ के प्रेम से,बोलें मीठें बोल।
बोलें मीठे,बोल हृदय जो,सुंदर भाये।
द्वेष कपट हो,दुश्मन भी हो,गले लगाये।
आशा वाणी,ये कहती है,मन के अंदर।
निर्मल पावन,जनहित बोलें,वाणी सुंदर।।
नेक सृजन का सार हो,जग का हो उद्धार।
सुंदर नव पथ मार्ग पर,चले कलम की धार।।
चले कलम की-धार करे जो,नव उजियारा।
सुंदर कविता,गढ़ दें ऐसा,लागे न्यारा।।
आशा वाणी,ये कहती है,खुश हो जन मन।
कलम उठाकर,कवि सब रचदें,नव नेक सृजन।।
सदा अहम् की हार है,ऐसा दें संदेश।
प्रेम भाव अपनत्व से,मन का मिटता क्लेश।
मन का मिटता,क्लेश हृदय को,सुंदर रखता।
हो उदार जो,करुणा रखता,वो ही बढ़ता।
आशा वाणी,ये कहती हे,कर्म सर्वदा।
ध्यान धरें सब,काम बिगाड़े,ये अहम् सदा।
पारस होती बेटियाँ,इनसे घर संसार,
विश्व धरा की सार है,बाँटे निश्छल प्यार,
बाँटे निश्छल,प्यार सभी को,बाँधे रखती,
रिश्ते नाते,सदा निभाती,दुख सब सहती,
आशा वाणी,ये कहती है,देती साहस,
सदा रही है,सदा रहेगी,बेटी पारस।
शिक्षक तो वरदान है,धरती के अभिमान,
दिव्य ज्योत भंडार से,बाँटे निसदिन ज्ञान,
बाँटे निसदिन,ज्ञान दीप को,हृदय जलाते,
जिनगी गढ़ते,अँधकार को,दूर भगाते,
आशा वाणी,ये कहती है,सच्चा दीक्षक,
इस धरती पर,परम पूज्य है,सारे शिक्षक।।
लक्ष्य हमारा श्रेष्ठ हो,सुंदर हो सब राह,
जनहित अपना कर्म हो,जीवन की हो चाह,
जीवन की हो,चाह बने हम,कर्मठ ज्ञानी,
रोते जन को,सदा हँसाये,बनकर दानी,
आशा वाणी,ये कहती है,बने सहारा,
कष्ट मिटाना,एकमात्र हो,लक्ष्य हमारा।
बहुत बड़ी है आपदा,लाये प्रलय विशाल।
पल भर में सब खत्म हो,लाये सबका काल।
लाये सबका,काल सुनो जल,से भी खतरा।
घर न बनाये,समुद्र होवे,ज्यादा गहरा।
आशा वाणी,ये कहती है,दुखद घड़ी है।
बहकर मरते,यह विपदा भी,बहुत बड़ी है।
लक्ष्य हमारा श्रेष्ठ हो,सुंदर हो सब राह,
जनहित अपना कर्म हो,जीवन की हो चाह,
जीवन की हो,चाह बने हम,कर्मठ ज्ञानी,
रोते जन को,सदा हँसाये,बनकर दानी,
आशा वाणी,ये कहती है,बने सहारा,
कष्ट मिटाना,एकमात्र हो,लक्ष्य हमारा।
बहुत बड़ी है आपदा,जल का प्रलय विशाल।
पल भर में सब खत्म हो,लाये सबका काल।
लाये सबका,काल सुनो जल,से भी खतरा।
घर न बनाये,समुद्र होवे,ज्यादा गहरा।
आशा वाणी,ये कहती है,दुखद घड़ी है।
बहकर मरते,यह विपदा भी,बहुत बड़ी है।।
सदा योग से लाभ है,कहते है सब संत,
भोर भये शुभ काल में,बीमारी का अंत,
बीमारी का,अंत हृदय को,निर्मल रखता,
शुद्ध श्वास दे,रक्त तंत्र में,निसदिन बढ़ता,
आशा वाणी,ये कहती है,बहुत फायदा,
गुणकारी है,सेहत देती,यह योग सदा।
आडंबर में क्या धरा,धन का क्यों हो लोभ,
जब बिगड़े है काज तो,अनुभव होता क्षोभ,
अनुभव होता,क्षोभ तभी जब,काल बुलाता,
व्यर्थ किया था,लोभ सोचकर,प्राण गँवाता,
आशा वाणी,ये कहती है,मन अंतर में,
संयम रखलें,क्यों जीना है,आडंबर में।
वसुंधरा पर बेटियाँ,अनुपम है सौगात,
भ्रूण नाश अपराध है,ध्यान धरें ये बात,
ध्यान धरें ये,बात मान लें,पाप न करना,
भ्रूण नाश के,बुरे कृत्य से,हरपल बचना,
आशा कहती,व्यर्थ दिखावा,परंपरा पर,
बेटी है जो,अवतारी है,वसुंधरा पर।।
निर्धन जन के पीर को,देख बढ़ाये हाथ,
दुख पीड़ा में जल रहे,उनका दें दें साथ,
उनका दें दें,साथ अगर हम,सक्षम धन से,
अन्न दान कर,पुस्तक कापी,बाँटें मन से,
आशा कहती,धर्म निभाये,कर अभिवर्धन,
ज्ञान दान कर,बने सहारा,है जो निर्धन।
पुलिस प्रशासन को नमन,अंतस से सम्मान,
नित्य सुरक्षा दे रहे ,यही देश की शान,
यही देश की,शान फर्ज है,सदा निभाते,
कोरोना ये,हो न संक्रमित,ये सिखलाते,
आशा कहती,दीन दुखी को,देते राशन,
जन सेवा को,सदा निभातें,पुलिस प्रशासन।।
पुलिस सुरक्षा दे रही,फैली है चहुँओर,
अनुशासन के रोक पर,खड़ी रहे हर छोर,
खड़ी रहे हर,छोर रखें है,सब निगरानी,
डंडे पड़ते ,रोज करे है,जो मनमानी,
आशा कहती,करे न इनकी,कभी उपेक्षा,
तन मन देकर,हरपल करते,पुलिस सुरक्षा।
पानी जितना हो सके,घर पर खूब बचाय,
प्यासे को पानी मिले,ऐसा कुछ कर जाय,
ऐसा कुछ कर,जाय बचत की,राह बताएँ,
व्यर्थ गँवाते,है जन सबको,बचत कराएँ,
आशा कहती,ध्यान धरें औ,होवें ज्ञानी,
नित्य धरा पर,आज देखलो,घटता पानी।
पानी के इस मोल को,जन-जन समझे आज,
भोर भये माँगे सभी,होवे इससे काज,
होवे इससे,काज सभी को,यही समझना,
व्यर्थ गँवाकर,बाद पड़ेगा,खूब तरसना,
आशा कहती,कभी न करना,ये मनमानी,
जीवन देती,अमृत सदा से,होता पानी।
रक्त दान तो पुण्य है,नेकी का है कर्म,
सदा निभायें प्रेम से,मानवता का धर्म,
मानवता का,धर्म नेक जो,जीव बचाएँ,
पुण्य कमाले,रक्तदान की,सोच बनाएँ,
आशा कहती,पीड़ा देख न,बने अंजान,
जनहित में सब,सदा करावें,सब रक्त दान।
रक्त नित्य बनता सुनो,रखलो यह संज्ञान,
लाल रक्त के कण सभी,रक्त तंत्र में मान,
रक्त तंत्र में ,मान इसी से ,सेहत बनता,
डरे नही यह,बात समझलें,कभी न घटता,
आशा कहती,पौस्टिक खावें,सब रहे मस्त,
नित्य निरंतर,तन पर अपने,है बढ़े रक्त।।
अष्टदशाक्षरावृति छंद
अष्टदशाक्षरावृति छंद
221 111 212, 212 212 212
है दीन तरसते सदा,पेट खाली रहे जान लें।
कैसै सुखमय हो भला,हाथ दें दें सभी भान लें।।
ज्ञानी बनकर बाटिएँ,ज्ञान का नित्य संचार हो।
देखो तड़पन आज जो,प्रेम बाँटें व सत्कार हो।।
आओ मिलकर कर्म से,धर्म की राह में दान दें।
शिक्षा अनुपम दान है,प्रेम निस्वार्थ से ज्ञान दें।।
देखो तड़पन भूख की, कष्ट होता परेशान है।
जो आज तरसते अन्न को,वे सभी नेक इंसान है।।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
221 111 212, 212 212 212
है दीन तरसते सदा,पेट खाली रहे जान लें।
कैसै सुखमय हो भला,हाथ दें दें सभी भान लें।।
ज्ञानी बनकर बाटिएँ,ज्ञान का नित्य संचार हो।
देखो तड़पन आज जो,प्रेम बाँटें व सत्कार हो।।
आओ मिलकर कर्म से,धर्म की राह में दान दें।
शिक्षा अनुपम दान है,प्रेम निस्वार्थ से ज्ञान दें।।
देखो तड़पन भूख की, कष्ट होता परेशान है।
जो आज तरसते अन्न को,वे सभी नेक इंसान है।।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
Wednesday, 15 April 2020
सरसी गीत
सरसी गीत
माता रानी अब तो आओ,करती तेरा जाप,
कलयुग में माँ बुरा कृत्य है,नित्य बढ़े है पाप।
नन्हीं बाला तड़प रही है,सुनलें उसकी चींख,
लाज बचादे चुप क्यों बैठी,माँगे तुझसे भींख,
नित्य वासना मानुष मन में,तन का ये अभिताप,
माता रानी अब तो आओ,करती तेरा जाप।
पथ पर सुनले जब भी जाये,घेरें उसको लोग,
तार तार अस्मत को करते,समझे केवल भोग,
ये कैसा कलयुग है माता,करें न पश्चाताप,
माता रानी अब तो आओ,करती तेरा जाप।
भाई भाई में खून खराबा,जायदाद का लोभ,
अति चाहत की बढ़े लालसा,कभी न करते क्षोभ
नित्य घटे है आज देखले,रिश्तों का परिमाप,
माता रानी अब तो आओ,करती तेरा जाप।
मानवता का पाठ पढ़ाने,ले माँ तू अवतार,
हृदय भाव में समता भरदे,संभव तब उद्धार,
नारी प्रताप अंतस मन में,करें सभी आलाप,
माता रानी अब तो आओ,करती तेरा जाप।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
पता- मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
तातंक छंद गीत
तातंक छंद गीत
देश प्रेम में कर्म करेंगे,सुंदर जग हो जाएगा,
अनुशासन के पालन से ही,नवपरिवर्तन आएगा।
द्वेष कपट को दूरभगाकर,मानवता को लाना है,
सत्य हृदय मे वास करे ये,नित्य हमें अपनाना है,
जब अनुशासित मानुष होगा,पाप पनप नही पाएगा,
देश प्रेम में कर्म करेगें,सुंदर जग हो जाएगा।
मातृ वंदना नित्य करें तो,मान बचेगा नारी का,
माँ बेटी औ बहन कहेगें,समझे मन अवतारी का,
नेक हदय का भाव रखेगें,तब मानव कहलाएगा
देश प्रेम में कर्म करेगें,सुंदर जग हो जाएगा।
अंतस मन से प्रण ये करलो,सारे भेद मिटाएगें,
निर्मलता को धारण करके,रिश्तें सभी निभाएगें,
नवपरिवर्तन करना हमको,मन में सोच समाएगा,
देश प्रेम में कर्म करेगें,सुंदर जग हो जाएगा।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
तातंक छंद गीत
तातंक छंद गीत
पुलकित है मेरे नैन सलोने, मन बिछा रंगोली रे,
मैं तो भीगी पिया जी के रंग,खूब खेलूँ होली रे।।
मैं कुछ इतराऊँ कुछ बलखाऊँ,नैन जब टकराये जी,
आएँ मुख पर जब गुलाल मलने,मन बहुत शर्माये जी,
लगता जैसै सारी ये खुशियाँ,आज भरती झोली रे,
पुलकित है मेरे नैन सलोने,मन बिछा रंगोली रे।
इस होली की है बात निराली,मन आज सुंदर लागे है,
जहाँ भागते है पिय मस्ती में,मन मधुर ये भागे है,
हृदय भाव पुलकित मुस्काता,मन प्रेम की रोली रे,
पुलकित है मेरे नैन सलोने, मन बिछा रंगोली रे।
साजन मुझको आज रंग दो जी,प्रेम अगाड़ गहरा हो,
तेरे नाम के सभी रंग गुलाल हो,मन रंग का पहरा हो,
नित्य घेरकर चिढ़ा रही सखियाँ,छेड़ते है हमजोली रे,
पुलकित है मेरे नैन सलोने, मन बिछा रंगोली रे।
रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
सरसी छंद गीत
सरसी छंद गीत-श्रीमती आशा आजाद
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।
भूले से भी कभी न बिगड़े,धरती का श्रृंगार।।
छिपा हुआ भूगर्भ सहत पर,भूजल का भंडार।
शुद्ध रुप में बहे निरंतर,इससे ही संसार।
व्यर्थ कभी मत सुनो गँवाना,सुनो नीर उपहार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
खनिज संपदा बहुत धरा पर,वंसुधरा की शान।
मानव जीवन पर लोहा का,बहुत बड़ा है स्थान।
जितना हो जरुरत बस निकले,कहे धरा यह सार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।
आज कोयला गर्भ धरा से,खूब निकाले खान।
धरा नष्ट हो रही निरंतर,होय भूस्खलन जान।
रिक्त जगह को भरते जाएँ,तब होगा उद्धार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
वृक्ष न काटे खूब लगाये,समझें इसका मोल।
मानसून है इसपर निर्भर,मानव आँखें खोल।
पौधारोपण करें सभी जन,स्वस्थ देह का द्वार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
वन्य जीव व्याकुल है कितने,कितने वे बेचैन।
कटते जंगल लोभ मोह में,छिनता उनका रैन।
यहाँ वहाँ भटकने ना दे,होवें न निराधार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
गीतकार-श्रीमती आशा आजाद
पता मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
कुकुभ छंद गीत
कुकुभ छंद गीत
मन के हम है सच्चे सुंदर,अपनी मीठी भाषा है,
नही दिव्यांग मन के सुनलो,मंजिल की अभिलाषा है।
नेक कर्म करने की चाहत,सदा जोश हम रखते है,
नही किसी के पाँव मगर हम,मन से नित हम चलते है
नही कमजोर हाथ नही जो,मन अपनी परिभाषा है,
नही दिव्यांग मन के सुनलो,मंजिल की अभिलाषा है।
भेदभाव को दूर भगाये,सच्चे मन को पहचाने,
मानवता के पथ पर चलना,कर्म समझ अपना जाने,
समता का नित भाव धरें सब, जैसै राष्ट्रभाषा है,
नही दिव्यांग मन के सुनलो,मंजिल की अभिलाषा है।
रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
चौपाई छंद
चौपाई छंद-श्रीमती आशा आजाद
मेरा सुंदर गाँव निराला
मेरा सुंदर गाँव निराला।हर्षित मन को करने वाला।
शुद्ध हवा जो निसदिन आये।तन मन को सब शुद्ध बनाये।।
पंक्षी मधुरिम गीत सुनाते।चीं चीं करके हृदय लुभाते।
निर्मल वातावरण लुभाता।सेहत सबके मन को भाता।।
गोबर के कंडे से जानो।धुँआ मारता मच्छर मानो।
घर आँगन है मन को भाता।गोबर से जब है लिप जाता।।
नही प्रदूषण वहाँ सताता।मानुष सुंदर देह बनाता।
सदा मेहनतकश वो होता।बहुत भार वह निसदिन ढोता।।
नही शोरगुल नही लड़ाई।आपस में सब भाई भाई।
विपदा मिलकर दूर भगाते।प्रेम दीप का ज्योत जलाते।।
है आधार वहाँ बस खेती।जो हमको है जीवन देती।
अन्न उगाकर जीवन देते।संतुष्टी अपना है लेते।।
बीमारी का नही है रोना।नित्य मेहनत समझे सोना।
वहाँ नही तन सेहत खोता।गाँव शहर से सुंदर होता।।
सुंदर ऐसा गाँव बनाना।जाने पर वह लगे सुहाना।
शुद्ध हवा का आना जाना।इससे सुंदर नही ठिकाना।।
छंदकार-श्रीमती आशा आजाद
पता मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
Monday, 6 April 2020
सरसी छंद गीत
सरसी छंद गीत
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
अंतर के पट खोल तभी तो,मन होवे उजियार।।
कर्म करे जो मन को भाये,मृदु वाणी रस घोल,
सत्य वचन को हृदय बसाये,कर्म का समझे मोल,
क्षणिक समय में पुण्य काज हो,जन्में ये सुविचार,
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
मन में कभी न द्वेष समाये,ऐसा करलें कर्म,
दीन दुखी की सेवा करना,बनें हमारा धर्म,
अन्नदान की राह में चलना,बने यही संस्कार,
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
है अनाथ जो जीवन जीते,उनका हो उद्धार,
पालन पोषण शिक्षित करके,दें सुंदर व्यवहार,
इस धरा पर मानुष ही है,शुभ वर के करतार,
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
दिव्यांगों को मार्ग दिखाना,उनका देवें साथ,
कदम मिलाकर हिम्मत बाँधे,सदा बढ़ायें हाथ,
सकल जगत में नेकी गूँजे,बनके नव झनकार,
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
कोरबा छतीसगढ़
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
अंतर के पट खोल तभी तो,मन होवे उजियार।।
कर्म करे जो मन को भाये,मृदु वाणी रस घोल,
सत्य वचन को हृदय बसाये,कर्म का समझे मोल,
क्षणिक समय में पुण्य काज हो,जन्में ये सुविचार,
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
मन में कभी न द्वेष समाये,ऐसा करलें कर्म,
दीन दुखी की सेवा करना,बनें हमारा धर्म,
अन्नदान की राह में चलना,बने यही संस्कार,
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
है अनाथ जो जीवन जीते,उनका हो उद्धार,
पालन पोषण शिक्षित करके,दें सुंदर व्यवहार,
इस धरा पर मानुष ही है,शुभ वर के करतार,
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
दिव्यांगों को मार्ग दिखाना,उनका देवें साथ,
कदम मिलाकर हिम्मत बाँधे,सदा बढ़ायें हाथ,
सकल जगत में नेकी गूँजे,बनके नव झनकार,
चाह अगर सुंदर जीवन का,त्याग दें अहंकार।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
कोरबा छतीसगढ़
Friday, 3 April 2020
दोहा मुक्तक
दोहा मुक्तक
महामारी
देख महामारी बड़ा,पकड़ रहा है जोर
कोरोना का रोग ये,फैला है चहुँओर
करे संक्रमित देह को,रहना होगा दूर,
झूठ बोलकर लोग कुछ,व्यर्थ करे है शोर।।
जीवन तो अनमोल है,रखलें थोड़ा ध्यान
सतर्कता हरपल रखें,लेकर पूरा ज्ञान,
फैले सूक्ष्म किटाणु से,स्पर्स करे हो जाय।
घर के बाहर रोक है,सुंदर ये अभियान।।
बिगड़ रहे हालात है,फैले निसदिन रोग,
होते है जो नासमझ,कुछ अज्ञानी लोग,
सबको नेक सलाह दें,रखलें थोड़ा धीर,
जनहित के इस राह पर,सभी करें सहयोग।।
कोरोना तो अभिशाप है,मानुष तन का पीर,
रखे सुरक्षा आप ही,घर पर खींच लकीर,
जन मानुष के कर्म में,देना होगा सीख,
विपदाओं को टालकर,पाये स्वस्थ शरीर।।
अनुशासन के रोक पर,हो जाए गंभीर,
साथ प्रशासन के चलें,होवें नही अधीर,
जनहित का ये काम है,रोग भगेगा दूर,
जनता जागरूक हो,बदले खुद तस्वीर।।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
पता -मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
महामारी
देख महामारी बड़ा,पकड़ रहा है जोर
कोरोना का रोग ये,फैला है चहुँओर
करे संक्रमित देह को,रहना होगा दूर,
झूठ बोलकर लोग कुछ,व्यर्थ करे है शोर।।
जीवन तो अनमोल है,रखलें थोड़ा ध्यान
सतर्कता हरपल रखें,लेकर पूरा ज्ञान,
फैले सूक्ष्म किटाणु से,स्पर्स करे हो जाय।
घर के बाहर रोक है,सुंदर ये अभियान।।
बिगड़ रहे हालात है,फैले निसदिन रोग,
होते है जो नासमझ,कुछ अज्ञानी लोग,
सबको नेक सलाह दें,रखलें थोड़ा धीर,
जनहित के इस राह पर,सभी करें सहयोग।।
कोरोना तो अभिशाप है,मानुष तन का पीर,
रखे सुरक्षा आप ही,घर पर खींच लकीर,
जन मानुष के कर्म में,देना होगा सीख,
विपदाओं को टालकर,पाये स्वस्थ शरीर।।
अनुशासन के रोक पर,हो जाए गंभीर,
साथ प्रशासन के चलें,होवें नही अधीर,
जनहित का ये काम है,रोग भगेगा दूर,
जनता जागरूक हो,बदले खुद तस्वीर।।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
पता -मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
सरसी छंद गीत
सरसी छंद गीत...
कोरोना से डरो नही ना
डरो नही अब कोरोना से,दूर बीमारी जाएगा,
अनुशासन के पालन से ही,नवपरिवर्तन आएगा।
मिथ्या बातें छोड़ छाड़ के,मानवता को लाना है,
सर्तकता का ध्यान धरें ये,नित्य हमें अपनाना है,
जब अनुशासित मानुष होगा,रोग पनप ना पाएगा,
डरो नही अब कोरोना से,दूर बीमारी जाएगा।
देह संक्रमित होने ना दे,रहे सब सावधानी से ,
सेनेटाइज रखना होगा,भूल न हो नादानी से,
घर के अंदर स्वस्थ रहेगा,सत्य बात अपनाएगा।
डरो नही अब कोरोना से,दूर बीमारी जाएगा।
अंतस मन से प्रण ये करलो,जड़ से रोग मिटाएगें,
अनुशासित रहकर हम सारे,रिश्तें सभी निभाएगें,
नवपरिवर्तन करना हमको,मन में सोच समाएगा,
डरो नही अब कोरोना से,दूर बीमारी जाएगा।
करना दृणसंकल्प हमें ये,हम ही भारतवासी है,
हर मुश्किल से लड़ जाते है,हम ही मथुरा कासी है,
घर परिवार सुरक्षित होगा,तब ही ये जग भाएगा,
कोरोना से डरो नही ना,दूर बीमारी जाएगा।।
खाँसी हो बुखार जकड़ ले,डाक्टर को बतलाना है,
खतरनाक वायरस न घेरे,हमको मास्क लगाना है,
अनुसाशन के रोक से सुनलो,स्वस्थ देश कहलाएगा,
डरो नही अब कोरोना से,दूर बीमारी जाएगा।
छंदकार-श्रीमती आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
अमृतध्वनि छंद
आशा की अमृत वाणी
अमृतध्वनि छंद
राष्ट्रवाद का ध्यान धर,करना होगा कर्म।
जनहित की ये राह है,समझे अपना धर्म।
समझे अपना,धर्म देश हित,फर्ज निभाये।
भाईचारा,समता रखना,ये सिखलाये।
आशा वाणी,ये कहती है,सुन आर्तनाद।
हृदय भाव में,सदा विराजे,शुभ राष्ट्रवाद।
मदिरा पीना छोड़ दे,पीता क्यों दिन रैन।
जहरीला ये पान है,छीनें सबका चैन।।
छीनें सबका-चैन मान अरु,सबकुछ खोता।
घरवाली से,झगड़ा करके,फिर है रोता।।
आशा कहती है,बहे पसीना।
कर्म घर्म को,मान त्याग दे,मदिरा पीना।।
निश्छल ममता माँ करे, ये जीवन आधार ।
निर्मल मन से बाँटती, हृदय भाव से प्यार ।
हृदय भाव से- प्यार बाँटकर, धर्म निभाती ।
दुख सुख सहकर, कष्ट उठाकर, फर्ज सिखाती ।
आशा कहती , नेेेक कर्म अरु, रखती समता ।
जगत सार है, हृदय भाव में, निश्छल ममता ।।
जल की कीमत जान लें,रखलें सदा सहेज।
नित्य तड़पते जल बिना,पुण्य कमाये भेज।।
पुण्य कमाये,भेज उन्हें जो,दीन दुखी है।
बड़े दूर से,पानी लाते,नही सुखी है।।
आशा वाणी,ये कहती है,जल दें हर पल।
व्यर्थ न होवें,कभी किसी के,हाथों से जल।।
सुंदर मीठे बोल हो,करें नेक व्यवहार।
छोटी सी है जिंदगी,बाँटे सबको प्यार।।
बाँटे सबको,प्यार हृदय से,निश्छल मन हो।
कर्म करे सब,प्रेम भाव से,पुलकित जन हो।।
आशा वाणी,ये कहती है,अपने अंदर।
आप बनाये,श्रेष्ठ छवि तन,मन को सुंदर।।
नेक सृजन का सार हो,जग का हो उद्धार।
सुंदर नव पथ मार्ग पर,चले कलम की धार।।
चले कलम की-धार करे जो,नव उजियारा।
सुंदर कविता,गढ़ दें ऐसा,लागे न्यारा।।
*आशा* वाणी,ये कहती है,खुश हो जन मन।
कलम उठाकर,कवि सब रचदें,नव नेक सृजन।।
कोरोना का रोग ये,लेता सबकी जान।
रोग बड़ा संक्रमित है,रखलो यह सब ज्ञान।।
रखलो सब यह,ज्ञान घरों से,नही निकलना,
घर के भीतर,रहें सुरक्षित, बात समझना।।
आशा वाणी,ये कहती है,धीर न खोना।
नित्य चहुँओर,फैल रहा है,ये कोरोना।।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
अमृतध्वनि छंद
राष्ट्रवाद का ध्यान धर,करना होगा कर्म।
जनहित की ये राह है,समझे अपना धर्म।
समझे अपना,धर्म देश हित,फर्ज निभाये।
भाईचारा,समता रखना,ये सिखलाये।
आशा वाणी,ये कहती है,सुन आर्तनाद।
हृदय भाव में,सदा विराजे,शुभ राष्ट्रवाद।
मदिरा पीना छोड़ दे,पीता क्यों दिन रैन।
जहरीला ये पान है,छीनें सबका चैन।।
छीनें सबका-चैन मान अरु,सबकुछ खोता।
घरवाली से,झगड़ा करके,फिर है रोता।।
आशा कहती है,बहे पसीना।
कर्म घर्म को,मान त्याग दे,मदिरा पीना।।
निश्छल ममता माँ करे, ये जीवन आधार ।
निर्मल मन से बाँटती, हृदय भाव से प्यार ।
हृदय भाव से- प्यार बाँटकर, धर्म निभाती ।
दुख सुख सहकर, कष्ट उठाकर, फर्ज सिखाती ।
आशा कहती , नेेेक कर्म अरु, रखती समता ।
जगत सार है, हृदय भाव में, निश्छल ममता ।।
जल की कीमत जान लें,रखलें सदा सहेज।
नित्य तड़पते जल बिना,पुण्य कमाये भेज।।
पुण्य कमाये,भेज उन्हें जो,दीन दुखी है।
बड़े दूर से,पानी लाते,नही सुखी है।।
आशा वाणी,ये कहती है,जल दें हर पल।
व्यर्थ न होवें,कभी किसी के,हाथों से जल।।
सुंदर मीठे बोल हो,करें नेक व्यवहार।
छोटी सी है जिंदगी,बाँटे सबको प्यार।।
बाँटे सबको,प्यार हृदय से,निश्छल मन हो।
कर्म करे सब,प्रेम भाव से,पुलकित जन हो।।
आशा वाणी,ये कहती है,अपने अंदर।
आप बनाये,श्रेष्ठ छवि तन,मन को सुंदर।।
नेक सृजन का सार हो,जग का हो उद्धार।
सुंदर नव पथ मार्ग पर,चले कलम की धार।।
चले कलम की-धार करे जो,नव उजियारा।
सुंदर कविता,गढ़ दें ऐसा,लागे न्यारा।।
*आशा* वाणी,ये कहती है,खुश हो जन मन।
कलम उठाकर,कवि सब रचदें,नव नेक सृजन।।
कोरोना का रोग ये,लेता सबकी जान।
रोग बड़ा संक्रमित है,रखलो यह सब ज्ञान।।
रखलो सब यह,ज्ञान घरों से,नही निकलना,
घर के भीतर,रहें सुरक्षित, बात समझना।।
आशा वाणी,ये कहती है,धीर न खोना।
नित्य चहुँओर,फैल रहा है,ये कोरोना।।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
Wednesday, 1 April 2020
सरसी छंद गीत
सरसी छंद गीत-श्रीमती आशा आजाद
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।
भूले से भी कभी न बिगड़े,धरती का श्रृंगार।।
छिपा हुआ भूगर्भ सहत पर,भूजल का भंडार।
शुद्ध रुप में बहे निरंतर,इससे ही संसार।
व्यर्थ कभी मत सुनो गँवाना,सुनो नीर उपहार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
खनिज संपदा बहुत धरा पर,वंसुधरा की शान।
मानव जीवन पर लोहा का,बहुत बड़ा है स्थान।
जितना हो जरुरत बस निकले,कहे धरा यह सार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।
आज कोयला गर्भ धरा से,खूब निकाले खान।
धरा नष्ट हो रही निरंतर,होय भूस्खलन जान।
रिक्त जगह को भरते जाएँ,तब होगा उद्धार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
वृक्ष न काटे खूब लगाये,समझें इसका मोल।
मानसून है इसपर निर्भर,मानव आँखें खोल।
पौधारोपण करें सभी जन,स्वस्थ देह का द्वार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
वन्य जीव व्याकुल है कितने,कितने वे बेचैन।
कटते जंगल लोभ मोह में,छिनता उनका रैन।
यहाँ वहाँ भटकने ना दे,होवें न निराधार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
गीतकार-श्रीमती आशा आजाद
पता मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।
भूले से भी कभी न बिगड़े,धरती का श्रृंगार।।
छिपा हुआ भूगर्भ सहत पर,भूजल का भंडार।
शुद्ध रुप में बहे निरंतर,इससे ही संसार।
व्यर्थ कभी मत सुनो गँवाना,सुनो नीर उपहार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
खनिज संपदा बहुत धरा पर,वंसुधरा की शान।
मानव जीवन पर लोहा का,बहुत बड़ा है स्थान।
जितना हो जरुरत बस निकले,कहे धरा यह सार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।
आज कोयला गर्भ धरा से,खूब निकाले खान।
धरा नष्ट हो रही निरंतर,होय भूस्खलन जान।
रिक्त जगह को भरते जाएँ,तब होगा उद्धार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
वृक्ष न काटे खूब लगाये,समझें इसका मोल।
मानसून है इसपर निर्भर,मानव आँखें खोल।
पौधारोपण करें सभी जन,स्वस्थ देह का द्वार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
वन्य जीव व्याकुल है कितने,कितने वे बेचैन।
कटते जंगल लोभ मोह में,छिनता उनका रैन।
यहाँ वहाँ भटकने ना दे,होवें न निराधार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।
गीतकार-श्रीमती आशा आजाद
पता मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
चौपाई छंद
चौपाई छंद-श्रीमती आशा आजाद
मेरा सुंदर गाँव निराला
मेरा सुंदर गाँव निराला।हर्षित मन को करने वाला।
शुद्ध हवा जो निसदिन आये।तन मन को सब शुद्ध बनाये।।
पंक्षी मधुरिम गीत सुनाते।चीं चीं करके हृदय लुभाते।
निर्मल वातावरण लुभाता।सेहत सबके मन को भाता।।
गोबर के कंडे से जानो।धुँआ मारता मच्छर मानो।
घर आँगन है मन को भाता।गोबर से जब है लिप जाता।।
नही प्रदूषण वहाँ सताता।मानुष सुंदर देह बनाता।
सदा मेहनतकश वो होता।बहुत भार वह निसदिन ढोता।।
नही शोरगुल नही लड़ाई।आपस में सब भाई भाई।
विपदा मिलकर दूर भगाते।प्रेम दीप का ज्योत जलाते।।
है आधार वहाँ बस खेती।जो हमको है जीवन देती।
अन्न उगाकर जीवन देते।संतुष्टी अपना है लेते।।
बीमारी का नही है रोना।नित्य मेहनत समझे सोना।
वहाँ नही तन सेहत खोता।गाँव शहर से सुंदर होता।।
सुंदर ऐसा गाँव बनाना।जाने पर वह लगे सुहाना।
शुद्ध हवा का आना जाना।इससे सुंदर नही ठिकाना।।
छंदकार-श्रीमती आशा आजाद
पता मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
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