Saturday, 25 April 2020

अमृतध्वनि छंद

आशा की अमृत वाणी...✍️

अमृतध्वनि छंद

                   मजदूर
रोजी रोटी की ललक,मजदूरों का जंग,
रोज कमाते देख लो,जलता निसदिन अंग,
जलता निसदिन-अंग भूख से,सदा तड़पते,
कठिन परिश्रम,करते फिरभी,भूखें रहते,
आशा कहती,बात नही है,कोई छोटी,
दूर देश में,जाय कमाने,रोजी रोटी।

कड़ी तपन से देह पर,छाले पड़े हजार,
मजदूरी है कुछ नही,टूटा घर औ द्वार,
टूटा घर औ-द्वार नही है,राशन पानी,
आज देख लो,मजदूरों की,यही कहानी,
आशा कहती,नित्य सहे ये,भूख की अगन,
दिल रोता है,हाल देखकर,ये कड़ी तपन।

                  मोबाइल
मोबाइल के दौर में,चिट्ठी का क्या काम
क्षण भर में सब काम हो,ये ही चारों धाम,
ये ही चारो -धाम सभी को,इसकी इच्छा,
सभी चाहते,मोबाइल हो,मेरा अच्छा,
ढूँढ निकाले,क्षण भर में ये,कोई फाइल,
मात पिता औ,बच्चे रखते,है मोबाइल।।

बच्चे बूढ़े आज तो,दिनभर करते चेट
शहर गाँव चहुँओर अब,व्यस्त रहे है नेट
व्यस्त रहे है-नेट पैक सब,फुल भरवाते
शौचालय में,आज देखलो,लेकर जाते
आशा कहती,पढ़ने में अब,होते कच्चे
घर के अंदर,गेम खेलते,रहते बच्चे।।

वक्त बड़ा अनमोल है,पुत्र न समझें बात,
लोभ हृदय में रख चले,करते है वे घात,
करते है वे-घात रुलाते ,मात पिता को,
तरस रहे है,भूलें बेटे,अब ममता को,
आशा कहती,वृद्धावस्था,तन से अशक्त,
जिम्मेदारी,सदा निभाया,था वो वक्त।

                   माँ
द्वार खड़े राह तकूँ,मन में है विश्वास,
व्याकुल तेरे नाम से,अब तो आजा पास,
अब तो आजा-पास बहुत है, तुझसे आशा,
क्षण क्षण छूटे,श्वास हमारी,होय निराशा,
आयु नही है,धीर धरे जो,वक्त से लड़े,
छोड़ रही हूँ,आज श्वास सुन,मैं द्वार खड़े।

माँ की ममता रो रही,हरपल रहूँ अनंद,
जब आएगा द्वार में,ताला होगा बंद,
ताला होगा-बंद तुझे माँ,नही मिलेगी,
खुश रहे तू,हर क्षण माँ सुन,यही कहेगी,
क्या खोया है,रिश्तें मे तू ,होय गहनता,
एक बार ही,मिलता सुनले,माँ की ममता।।

शिक्षा के नव ज्योत से,नित्य करें उत्थान,
दीन दुखित को भी सदा,बाँटें सुंदर ज्ञान,
बाटे सुंदर,ज्ञान साथ की,जरुरत उनको,
आप झाँकिए,दीन दुखी के,निर्मल मन को,
आशा कहती,शिक्षित करदें,देवें दीक्षा,
पुण्य मिलेगा,दान करें सब,निर्मल शिक्षा।

                    शिक्षा
शिक्षा करे विकास है,सुंदर यह सौगात,
जीवन सरल सहज बने,ध्यान धरे ये बात,
ध्यान धरें ये,बात इसी से,हो उजियारा,
हल मिल जाता,दूर भगे है,सब अँधियारा,
आशा कहती,ईश्वर लेते,सदा परीक्षा,
कर्म करे जो,जनहित होवें,देकर शिक्षा।

आओ साजन पास अब,प्रीत बड़ा तड़पाय,
हृदय बड़ा व्याकुल हुआ,सावन बीता जाय,
सावन बीता,जाय बहुत है,याद सताती,
हृदय न समझे,रह-रह कर ये,मुझे रुलाती,
आशा कहती,प्रेम भरा मन,सँग में लाओ,
तड़प रही हूँ,तन्हा अब तो,साजन आओ।

              साजन आओ
नैन बिछाएँ प्रेम में,आकर दो सौगात,
राह तके पथ को सदा,नीर बहे दिन रात,
नीर बहे दिन,रात जागती,सोचूँ हरपल,
सुखद मिलन की,आस हृदय को,कर रहा विकल,
आशा कहती,इस जगती में,कुछ नहिं भाएँ,
स्वप्न सँजोते,बैठी साजन,नैन बिछाएँ।

सखियों का वह शोर,अब न भाये सजना।
भूख प्यास सब त्याग,भूल गई मैं सँवरना।।
मुझको विरह सताय,सोच में निसदिन रहती।
अश्क बने अंगार,सनम आओ ये कहती।।
मेरी है यह दुर्दशा,हर क्षण जपती नाम हूँ।
आकर मुझको थाम लो,देती ये पैगाम हूँ।।

               लापरवाही
लापरवाही देख लें,अनहोनी हो जाय।
सब बच्चों को आज तो,वाहन ही है भाय।।
वाहन ही है,भाय जोश में,तेज चलाते।
नियम बने जो,नित्य तोड़ते,मजे उड़ाते।।
आशा कहती,अपनाते है,तानाशाही।
घटती घटना,करते है जो,लापरवाही।।

जीवन तो अनमोल है,जीवन के दिन चार।
है जो यातायात के,पढ़ें नियम का सार।।
पढ़ें नियम का,सार सभी फिर,पालन करलें।
दुर्घटना से,सदा बचे सब,सोच समझ लें।।
आशा कहती,ध्यान धरें सब,छोड़े खीवन।
गाँठ बाँध ले,जीना हमको,उत्तम जीवन।।

रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
कोरबा छत्तीसगढ़

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