Saturday, 18 April 2020

अष्टदशाक्षरावृति छंद

अष्टदशाक्षरावृति छंद

221 111 212, 212 212 212

है दीन तरसते सदा,पेट खाली रहे जान लें।
कैसै सुखमय हो भला,हाथ दें दें सभी भान लें।।
ज्ञानी बनकर बाटिएँ,ज्ञान का नित्य संचार हो।
देखो तड़पन आज जो,प्रेम बाँटें व सत्कार हो।।

आओ मिलकर कर्म से,धर्म की राह में दान दें।
शिक्षा अनुपम दान है,प्रेम निस्वार्थ से ज्ञान दें।।
देखो तड़पन भूख की, कष्ट होता परेशान है।
जो आज तरसते अन्न को,वे सभी नेक इंसान है।।

रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद

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