Sunday, 5 August 2018

कविता... मैं बूढ़ा हो गया

बेटा अब देख जरा मैं बूढ़ा हो गया,
आँखो का दिखना कमजोर हो गया;
चाल नही मेरी बेटा अब तेरे जितनी,
क्या करूँ रूक गया कमर झुक गया।

सुन जब तू बेटा पैदा नही हुआ था,
धन जुटाने में मैं बस लगा हुआ था;
पालन की उम्मीद जगी तब मुझें तो,
फिर जाकर बेटा तू  पैदा हुआ था।

बाहों मेंं उस वक्त बल मेरे बड़ा था,
तनकर जीवन में मैं बस खड़ा था;
संघर्ष किया मैनै परिवार के लिए,
मन और तन पर मेरे जोर बड़ा था।

धन कमाने का तब होड़ था मुझमें,
तुझे पढ़ाने का एक जोश था मुझमें;
कर्तव्य निभाकर तब ये मैनै अपना,
आत्मनिर्भर रखूँ यही चाह था मुझमें।

संघर्ष मेरा था उसे संपूर्ण कर दिया;
तुझे जो आत्म निर्भर मैनै कर दिया;
आज बेटा वृद्धावस्था में तुमने मुझें,
वृद्धों का आश्रम संघर्ष के बाद दिया।

वृद्ध मात-पिता पर क्या कर्तव्य है तेरा,
अंत समय में घर नही तेरा रहा मेरा;
वक्त से पहले क्यों छीन रहा है बेटा,
अर्थी पर लग जाए कांधा बस तेरा।

आश्रम में नही रहना वृद्धो के साथ,
रखना मेरे हाथों मे अब तेरा हाथ;
कर्तव्य निभा जा तू इस पुण्य कार्य से,
मुखाग्नि पर बस लगे ये तेरा हाथ।

रूपमाला छंद....बात मेरी मान

बात मेरी मान साथी,नाश दारू जान
शान सबका ये बिगाड़े,खोय सब सम्मान
नाश करता घर सभी का,देख बिगड़े काम
छोड़ दारू मान रखलो,होय तेरा नाम।।

मान पीके सब बिगड़ता, सत्य को पहचान
मान डूबा शान घटता ,राह भटके जान
होय झगड़ा रोज घर में,सुन लगाये आग
ध्यान धरके काम करलो ,जान मानुष जाग।।

ताटंक छंद ...बालिका की पीड़ा

देख लुटे है मान मेरा अब,तड़प रही हूँ मैं भारी।
जगह-जगह  में छुपे  लुटेरे,घेरे  है अत्याचारी।।

मैं  नारी  अवतार  हूँ सुनो ,पाप किया मैनै भारी।
बेटी आज है छली जा रही,कितने है अत्याचारी।।

बिलख रही हूँ तड़प रही हूँ,कौन कहे अवतारी हूँ।
मान अगर  मैं पाना चाहूँ,समझे बस एक नारी हूँ।।

राह  कौन  सा  अपनाऊँ,कहाँ  गुहार  लगाऊँ मैं ।
जीना चाहूँ नारी जीवन,दुख को ही बस पाऊँ मैं।।

कलयुग के मानव को देखा,नाबालिग को नोचे है।
देख  राक्षस  बन  बैठे  है,मान कौन फिर सोचे है।।

कहाँ खो गयी माँ की ममता,बेटी प्यार भुलाते है।
पापी बनकर  आज  देख लो,नारी को रूलाते है।।

मुझको कोख में मार गिराना,दुनियाँ में नहिं आना है।
तड़प तड़प के नहिं है जीना ,मुझको मान बचाना है।।

कविता...तेरी सोच का क्या है अभिप्राय

*छोटे कपड़े पहन रही है आज लड़कियाँ,*
*कहते है इसलिये होता आज है बलात्कार;*
*आठ साल की बच्ची को भी मैं ये बतादो,*
*दे दूँ क्या साड़ी पहनने का भी ये संस्कार...!*

*जनम लेते ही क्या उसे मैं बुरखा पहना दूँ,*
*या छीन लूँ उससे स्वतंत्र जीने का अधिकार;*
*निर्दयता से उसका पालन पोषण करूँ मैं,*
*या सिखादूँ मैं बचपन से सहना तिरस्कार..!*

*छोटी सी बच्ची का किस तरह पालन करूँ मैं,*
*सुरक्षा का कैसै कलयुग में उसे आधार दू मैं;*
*कोख से बाहर आ गई धरती पर ये बतादो,*
*किस तरह उसकी सुरक्षा का आगाज करूँ मैं...!*

*नवजन्मी बालिका का कैसै सत्कार करूँगी,*
*हो रहे अत्याचार को कैसै मैं स्वीकार करूँगी;*
*अपनी सोच को जब बदल नही पाया है मानव,*
*कोख में आने का अब मैं कैसै आहृवान करूँगी...!*

*ऐ मानव!सर्वप्रथम नेक सोच को स्वीकार कर,*
*बहन बेटी माँ के रिश्ते को हृदय से सत्कार कर;*
*तेरी नेक सोच श्रद्धा भाव हृदय में बसाना होगा,*
*तू नारी के तिरस्कार की सोच का सदा संहार कर...!*

आशा की कविता.... सोच रही हूँ

*राहों में खड़ी मैं गंभीर कुछ सोच रही हूँ,*
*अनाथों की पीड़ा का हल खोज रही हूँ...✍*

*क्यों अनाथ हो जाते है बच्चे धरती पर,*
*क्यों मजबूर करते है तिल तिल मरने पर...✍*

*माँ ने क्यों उसे जन्म देकर फेंक दिया,*
*निसहाय बालक का जन्म बत्तर किया...✍*

*किस पिता ने निर्दयता स्वीकार किया,*
*दर बदर भटकने को मजबूर कर दिया...✍*

*अनाथो की पीड़ा अनाथो ने ही जाना,*
*मानवता का धर्म हमें और है निभाना...✍*

*भूखे बिलखते बच्चों को मै देख रही हूँ,*
*उनकी तपन देख खुद आज रो रही हूँ...✍*

*भींख मांगने पर ये हो जाते है मजबूर,*
*दिन रात की तपन सहते है ये बेकसूर...✍*

*क्यों अपना समझ कोख मे पलने है देते,*
*दर बदर को भटकने बाहर है छोड़ देते...✍*

*अनाथो ने क्या पाप किया है ये कहदो,*
*प्यार दुलार सम्मान इन्हें भी कुछ देदो...✍*

*ना तन पर कपड़ा और फटी होती लंगोट,*
*बीमार पड़े रहते है ये लगने पर भी चोट...✍*

*ना पैसो की खनखन ना होता अनाज साथ,*
*पेट भर खा नही पाते और ना देता कोई हाथ...✍*

*तिरस्कार गालियाँ और मार की बौछार,*
*बेवजह कर देते है हम सब इनपर उतार...✍*

*काश अन्न का निवाला इन्हें खिला पाते,*
*कुछ पल की खुशियाँ शायद हम दे पाते...✍*

आशा के कुकुभ छंद...दारू मत पीना

सुंदर है जीवन सुन मानुष,तू ना जहर कभी पीना।
दारू का आदत जहरीला ,क्यों घुट-घुट कर है जीना।।

चोरी का रस्ता अपनाते ,पैसै चोरी करते है।
धर लेती जब पुलिस सभी को,जेल सजा में मरते है।।

घर पर विपदा होती है जब ,फिरभी नशा लगाते है ।
रोती है घरवाली घर पर,उसको बड़ा रुलाते है।।

बिन सोचें फिर मार-पीट कर,ऐसा नशा चढ़ाते है।
भुगत रहे है अपने सारे,भूखा रह मर जाते है।।

फटे पुराने कपड़े पहने,रहती तेरी घरवाली।
बिलख रहे है भूख से बच्चे ,पेट रहे उनका खाली।।

देख बिमारी की तड़पन को,तू तो होश गवांया है।
छोड़ जाएंगे तुझको सब झन,तुझमें नशा समाया है।।

दारू गांजा छोड़ सभी को,सुंदर जीवन तू जीले।
सबको दे तू प्रेम भाव को,मीठी वाणी रस पीले।।

आशा की कविता*कलम ने कहा*

*मैनै सोचा ! लिख दूँ क्या मैं अपनी गाथा,*
*कागज़ों पर उतार दूँ क्या स्वयं की व्यथा...✍*

*ना कलम ने लिखने में मेरा साथ दिया*
*और कागज ने भी कलम दरकिनार किया...✍*

*कलम ने कहा क्यों नही है तुझमें धीर,*
*क्यों हो जाती है तू स्वयं इतनी अधीर...✍*

*तू कलम थाम कर कुछ तो लिख सही,*
*स्वयं की गाथा को रख खुद से दूर कहीं...✍*

*तू लिख दें स्वालंबन की ऐसी कहानी,*
*पड़कर हो सदा ही तेरी जग बखानी...✍*

*तू लिख दें स्वाभिमान से सबको लड़ना,*
*प्रेरणा लेकर सीखें सदा आगे ही बड़ना...✍*

*तू लिख दें नारी के सम्मान की रक्षा,*
*स्वयं पर रहे निर्भर बस यही लें शिक्षा...✍*

*तू लिख नेक कर्म कर्तव्य को करना,*
*मानवता की राह पर निरंतर चलना...✍*

*तू लिख दें कागज पर ऐसी कहानी,*
*सुधर जाए सबकी मानव जिन्दगानी...✍*

*तू लिख दें अत्याचार पर ऐसा विरोध,*
*ना होगा राह में कभी भी कोई अवरोध...✍*

*लिख तू अनाथ ना करने की कहानी,*
*भ्रूण हत्या ना कर नारी जाति है बचानी...✍*

*तू लिख दें जाति-पाति का ना बंधन हो,*
*सबमें प्यार एकता का सदा ही संगम हो...✍*

*लिख तू धँरा में हो शांति का प्रतीक,*
*अमन चैन सुकुन में जीवन हो व्यतीत...✍*

*थामा जो तुमने प्रेरणा का दामन सदा,*
*कागज कलम ही होती है सबकी विद्या...✍*

*हर राह पर कलम तुझे खड़ा मिलेगा,*
*कागज का साथ ना कभी तेरा छूटेगा...

आशा के सरसी छंद..पानी बिन जीव हो कैसै

*पानी बिन जीवन हो कैसै,गाठ बांधले बात।*
*बचत ध्यान से पानी करलो,क्यों बहाए दिन रात।*💧

*पानी के गुण को सब जानो,ये जीवन आधार।*
*पानी बिन मानुष सुनले तू,जिनगी है बेकार।।*💧

*अमृत है पानी जीवन में,बचत करौं दिन रात।*
*लापरवाही क्यों करते हो,सुन दुखिया की बात।।*💧

*जिनके घर में पानी नहिं है,उनपर कर उपकार।*
*दूर गांव से पानी लाते,उनकी सुनो गुहार।।*💧

*गंदे पानी पीते है जो,पीड़ा रहे अपार।*
*बीमारी से मर जाते है, उनका कर उद्धार।।*💧

*लापरवाही करते है जो,व्यर्थ गवांते नीर।*
*बिन पानी के गरीब भुगते,हो बीमार शरीर।।*💧

*बूंद बूंद पानी सहेज लो,कीमत इसकी जान।*
*दानी बन जा पानी देकर,ये है काम महान।।*💧

*पानी बिन ना कोई तरसे,रखना तू संभाल।*
*व्यर्थ कभी ना पानी करना,सबका रखना ख्याल।।*💧

आशा के सरसी छंद...कविता

*कविता नही है देन किसी की,याद रखो ये बात।*
*कवि की लेखन निर्मल होती,है ना कोई जात।।*

*कविता है आवाज हृदय की,सृजन भाव आधार।*
*जो लिखते है हृदय भाव से,वो है साहित्यकार।।*

*कविता देती नित नव राहें,लेखन करे उद्धार।*
*जन जन तक नव कविता पहुँचे,सदा हो परोपकार।।*

*कविता रचना हो ऐसा सुन,सबका करें विकास।*
*भाईचारा जो गढ़दे वो,कविता उसकी दास।।*

*कविता का सम्मान करो सब,करो साधना रोज।*
*घट रहा जो वर्तमान में,वही सृजन का ओज।।*

*कविता में निस्वार्थ भावना,लेखन का आगाज।*
*जन का नव उद्धार करे हम,दे समता आवाज।।*

अब तो धरती पर अवतार लो माँ

सिंह आसन अब तो त्याग कर दो माँ,
धरती पर तुम आकर अवतार लो माँ;
हो रहा नारीयों पर आज जो अत्याचार,
आकर उन सबका तुम संहार करो माँ।
*अब तो धरती पर अवतार लो माँ....🙏🏼*

एक नन्हीं सी परी जो धरती पर आई माँ,
जी भर कर भी वो मुस्कुरा नही पाई माँ;
हो रहा आत्मघात जिन मासूमो पर आज,
अत्याचारी का जड़ से अब संहार करो माँ।
*अब तो धरती पर अवतार लो माँ....🙏🏼*

विश्वास में नारी को आज छला जा रहा माँ,
पग पग घिनौने कृत्य को रचा जा रहा है माँ;
राक्षसो का जिस तरह तूने संहार किया था,
आकर नारी को ऐसा ही नव वरदान दो माँ।
*अब तो धरती पर अवतार लो माँ....🙏🏼*

कभी नारी को बंदी बनाकर रख लेते है माँ,
कभी पाठशाला में तमाशा बन जाता है माँ;
अकेली तन्हां राहों में लुट रही मेरी अस्मत,
आकर सुरक्षा का आगाज तुम लगा दो माँ।
*अब तो धरती पर अवतार लो माँ....🙏🏼*

मैं स्कूल की बच्ची शिक्षा को पाने चली माँ,
मंदिर की सिड़ियों को प्रणाम कर चली माँ;
घेर लेते है महिसासुर जैसै पापी हर राह मुझे,
आकर नारी की सुरक्षा का आधार बनो माँ।
*अब तो धरती पर अवतार लो माँ....🙏🏼*

अब तो आकर नारी को ये अभयदान दो माँ,
अतःमन से नारी का सम्मान सबमें भर दो माँ;
भारत की इस धरती पर नारी की ये पुकार है,
नव रूप नव शस्त्रों को आकर प्रदान करो माँ।
*अब तो धरती पर अवतार लो माँ....🙏🏼*

नव दिन नवरात्र में नव रूप का संचार करो माँ,
विश्वजगत में नारी का तिरस्कार हर लो ना माँ;
एकता समरूपता का नाम रहे जगत में केवल,
ऐसा सुंदर संस्कार प्यार का अभयदान दो माँ।
*अब तो धरती पर अवतार लो माँ....🙏🏼*

आशा के छंद पकैया छंद...करलो सुंदर खेती

छन्न पकैया छन्न पकैया, करलो सुंदर खेती।
नई नई वैज्ञानिक पद्धति , नव राहें है देती।।

छन्न पकैया छन्न पकैया,फसलें नये लगाओ।
नई नई तकनीकों से अब,उन्नत फसल उगाओ।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, जैविक खादें डालो।
करके नव तकनीकों से तुम,जीवन सफल बनालो।।

छन्न पकैया छन्न पकैया,मछली पालन करलो।
नव तकनीकों से पालन कर,रोजगार नव धरलो।।

छन्न पकैया छन्न पकैया,उन्नत बीजें लाओ।
खेती कर अच्छे बीजो से,खुशहाली को लाओ।।

छन्न पकैया छन्न पकैया, ड्रिप विधि को अपनाओ।
नव साधन से सिंचाई करो,उन्नत फसलें पाओ।।

छन्न पकैया छन्न पकैया,लाभ योजना देगा।
खेती है जीविका किसान की,श्रृण कम बैंक लेगा।।

छन्न पकैया छन्न पकैया,सबसे बढ़कर खेती।
अन्न बिना जीवन हो कैसै,स्वस्थ देह है देती।।

आशा की कविता ....तिरंगा

तिरंगा का सबसे बड़ा है जनतंत्र,
तिरंगा में वीरता का गूँजता यहाँ मंत्र,
तिरंगा है माँ भारती का अभिमान,
तिरंगा के नीचे मानव जीता स्वतंत्र।

तिरंगा में शहीदों की कुरबानी बसी है,
तिरंगा में वीरों की जवानी बसी है;
तिरंगा का जिसने बढ़ाया है मान,
तिरंगा में स्वतंत्रता की कहानी बसी है।

तिरंगा में बलिदानो का मान बसा है,
तिरंगा में कुरबानी का खून बसा है;
तिरंगा के लिए जिसने दे दी अपनी जान,
तिरंगा में अपनो का सम्मान बसा है।

तिरंगा में मस्जिद गुरुद्वारे बसे है,
तिरंगा में चर्च और मंदिर बसे है;
तिरंगा में संस्कृति का सुंदर है आधार ,
तिरंगा में मधुर गीतो के भाव बसे है।

तिरंगा में बसा है सुंदर कश्मीर,
तिरंगा में बहता है गंगा का नीर;
तिरंगा के लिए सीना जिसने दिया चीर,
तिरंगा की शान शहीद है वो वीर।

तिरंगा में बसा है हमारा ये सम्मान,
तिरंगा में बसता है भारत का जान;
तिरंगा की शान ना कभी कम करना,
तिरंगा में जीना मरना अपनी है शान।

पिरामिड विधा..माँ


*माँ*
*तुझे*
*चरण*
*वंदन है,*
*तेरी ही कृपा*
*से ये धरती है,*
*तुझको नमन है...✍*
👸🏻👸🏻👸🏻👸🏻👸🏻👸🏻👸🏻
*तू*
*नारी*
*बेटी है,*
*बने माता,*
*रिश्ता बहन*
*का सबको भाता*
*तू ही है माँ विधाता...✍*

*ये*
*जग*
*सुंदर*
*तुझसे ही,*
*नव जीवन*
*देती कष्ट सहती,*
*पीड़ा सबकी लेती...✍*
👩🏼‍🔬👩🏼‍🔬👩🏼‍🔬👩🏼‍🔬👩🏼‍🔬👩🏼‍🔬
*ये*
*तेरी*
*देन है*
*मेरा जीवन,*
*कर्ज अपार है*
*उतारने का ना*
*कोई भी आधार है...✍*
👧🏻👧🏻👧🏻👧🏻👧🏻👧🏻
*माँ*
*सब*
*विपत्ति*
*को धारण*
*स्वयं करती,*
*सबको सुख दे*
*निश्छल प्यार देती...✍*
🤰🏻🤰🏻🤰🏻🤰🏻🤰🏻🤰🏻🤰🏻
*माँ*
*हर*
*रस से*
*भरी हुई*
*नेक सोच है,*
*सदा व्यवहार*
*समान ही रखती...✍*
👩🏻‍💼👩🏻‍💼👩🏻‍💼👩🏻‍💼👩🏻‍💻👩🏻‍💻👩🏻‍💻

पिरामिड विधा..माँ सरस्वती


पिरामिड विधा
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
हे
माँ
शारदे
दे आशीष
हृदय होता
आज पुलकित
ज्ञान का संचार दे।...✍
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
ये
सब
करते,
हृदय से
कामना माते,
साहित्य सृजन
सदैव मन बसे।...✍
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
दे
नव
किरण,
आलोकित
हो साहित्यिक
सफर हमारा,
पाये आशीष तेरा।...✍
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

आशा की कविता... सुंदरता का ज्ञान

सुंदरता का ज्ञान

सुन आशा ! मुझसे ग्रहण कर, सुंदरता का ज्ञान,
*आशा* ना करना कभी, भूले से भी अभिमान।

कर्म महत्ता जानकर,सत्कर्म का करना पहचान,
मानवता का भाव रख,इंसानियत का रखना मान।

भूख से पिड़ितो का तू,सुन करना सदा सम्मान,
खुद भूखी रहकर भी,अन्न का सदा करना दान।

दीन दुखियों का सहारा बन,करना तू काम महान,
तेरे सत्कर्म को सराहें,सदा ही ये सारा जहान।

कुरूप मन के भीतर जाकर,करना उसका बखान
रूप की चमक देखकर तू,करना ना झूठा गुनगान।

लालच के मोहमाया का, रखना तू सदा ही ज्ञान
संतुष्टि का जो अनादर करे,उनमें होता है अज्ञान।

नमन कर हृदय को अपने,सुंदरता का है ये ज्ञान,
प्रेम भाव सर्मपण का, रखना तू सदा ही मान।

रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद

पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़

 

Saturday, 4 August 2018

आशा की कविता...तू आ गया बेटा


तुझे देखने को आँखें है तरसती,
आँखो में आँसू मेरी नहीं थमती;
जिसने जना है कोख से तुझे बेटा,
वही तेरे आने की आस है करती।
तू आ गया बेटा.....

तूने क्यों मुझको नहीं जाना बेटा,
माँ के दिल को नहीं पहचाना बेटा;
अमृत की धारा तुझपर बहा दिया,
क्यों मुझे तू इतना रूला गया बेटा;
तू आ गया बेटा....

आजा बेटा आस लगी तेरे आने की,
समय आ गया अब तो मेरे जाने की;
अब तो आँखे भी धुँधली सी पड़ गई,
कही छूट ना जाए डोर मेरे सासों की,
तू आ गया बेटा....

तुझे मैनै पाला अपना फर्ज समझकर,
आजा तू मुझपर अपना कर्ज समझकर;
आके फैलादें मुझपर तू अपनी बाँहें बेटा,
जी उठेगी तुझे देख नव जन्म समझकर।
तू आ गया बेटा...

तू अभी मेरे अभी लिए बहुत है छोटा,
मौत के दरवाजे अब मैं खड़ी हूँ बेटा;
अब तो जिस्म से रूह निकल गई सुन,
अब मेरी रूह ने भी बस इतना ही कहा।
तू आ गया बेटा ......
तू आ गया बेटा.....

आशा के सार छंद.....आया देखो होली

🙏🏼💚💛🧡💜❤💙🖤🙏🏼

हँसी ठिठोली लेकर आया,आया देखो होली।
रंग भरे पिचकारी ले लो,मारो सबको गोली।।💙

छेड़ नगाड़ा साज सभी जन,मिल-जुल गाओ गाना।
बिछा  रहे  रंगोली  जैसै,मौसम  लगे  सुहाना।❤

मीठी-मीठी  बोली  रखना,सुंदर  बोलो  बोली।
तान लगाकर सबझन बोलो,होली है जी होली।।💜

लाल हरा रंग फेंक सबपर,पीला नीला डालो।
रहे  गुलाबी  रंग बसंती,गीत  मजे  से गालो।।

अपने साथी साथ रहे जी,नेक रहे जी बोली।
कोई  रूठा  ना  रहे जी,प्यार  भरा हो होली।।💛

होली है  भाई  होली  है,तान  लगाकर घूमो।
रंग बिरंगी इस धरती को,माथ नवाकर चूमो।।💚

*आशा* खेले ऐसी होली,अमृत वर्षा करदे।
हास्य विनोद दे जीवन में,प्रेम भाव को भरदे।।💙

आशा की कविता....माँ आज मुझे अपने कोख में ही मार दे

माँ आज मुझे अपने कोख में ही मार दे,
कलयुग का ना ये मुझको अत्याचार दे;
खून के आँसू देख आज पी रही हू मैं,
कोख में ही मारकर नारी को तू तार दे।😢

मैं नन्हीं सी एक सुंदर कली हूँ देख माँ,
शब्दों का उच्चारण कर नही पायी हूँ माँ;
नारी समझकर वेहसी बन रहे है कुछ लोग,
कोख में ही मार कर मेरा उद्धार करो माँ।😢

सब कहते है पाप है भ्रूण हत्या करना,
आज कुकृत्य को पड़ रहा है ऐसे सहना;
कष्ट ना होगा माँ जो कोख में ही मर जाऊँ,
दरिंदगी फैल रही अब कुछ नही है कहना।😢

आज देखो भारत का झंडा हाथों में लेकर,
बलात्कारियो को बेशर्म अपना साथ देकर;
बचाने निकल पड़े है अब तो सारे पापी देखो,
वे भी तो देखें जरा अस्मत की पीड़ा सहकर।😢

नेताओ का आज हृदय कहा रह गया है,
ऐसी दरिंदगी से आम आदमी सहम गया है;
भारत में आज लुट रहा है नारी का सम्मान ,
आज का प्रजातंत्र बस सत्ता पर थम गया है।😢

आज दुखदायी पीड़ा मैं जो ऐसे सह रही हूँ,
अन्तःमन की तड़प से घुट-घुट के मर रही हूँ;
कोख में नारी का अस्तित्व ही मिटादो माँ,
एक बाला के लिए यही प्रार्थना कर रही हूँ।😢