बेटा अब देख जरा मैं बूढ़ा हो गया,
आँखो का दिखना कमजोर हो गया;
चाल नही मेरी बेटा अब तेरे जितनी,
क्या करूँ रूक गया कमर झुक गया।
सुन जब तू बेटा पैदा नही हुआ था,
धन जुटाने में मैं बस लगा हुआ था;
पालन की उम्मीद जगी तब मुझें तो,
फिर जाकर बेटा तू पैदा हुआ था।
बाहों मेंं उस वक्त बल मेरे बड़ा था,
तनकर जीवन में मैं बस खड़ा था;
संघर्ष किया मैनै परिवार के लिए,
मन और तन पर मेरे जोर बड़ा था।
धन कमाने का तब होड़ था मुझमें,
तुझे पढ़ाने का एक जोश था मुझमें;
कर्तव्य निभाकर तब ये मैनै अपना,
आत्मनिर्भर रखूँ यही चाह था मुझमें।
संघर्ष मेरा था उसे संपूर्ण कर दिया;
तुझे जो आत्म निर्भर मैनै कर दिया;
आज बेटा वृद्धावस्था में तुमने मुझें,
वृद्धों का आश्रम संघर्ष के बाद दिया।
वृद्ध मात-पिता पर क्या कर्तव्य है तेरा,
अंत समय में घर नही तेरा रहा मेरा;
वक्त से पहले क्यों छीन रहा है बेटा,
अर्थी पर लग जाए कांधा बस तेरा।
आश्रम में नही रहना वृद्धो के साथ,
रखना मेरे हाथों मे अब तेरा हाथ;
कर्तव्य निभा जा तू इस पुण्य कार्य से,
मुखाग्नि पर बस लगे ये तेरा हाथ।