*राहों में खड़ी मैं गंभीर कुछ सोच रही हूँ,*
*अनाथों की पीड़ा का हल खोज रही हूँ...✍*
*क्यों अनाथ हो जाते है बच्चे धरती पर,*
*क्यों मजबूर करते है तिल तिल मरने पर...✍*
*माँ ने क्यों उसे जन्म देकर फेंक दिया,*
*निसहाय बालक का जन्म बत्तर किया...✍*
*किस पिता ने निर्दयता स्वीकार किया,*
*दर बदर भटकने को मजबूर कर दिया...✍*
*अनाथो की पीड़ा अनाथो ने ही जाना,*
*मानवता का धर्म हमें और है निभाना...✍*
*भूखे बिलखते बच्चों को मै देख रही हूँ,*
*उनकी तपन देख खुद आज रो रही हूँ...✍*
*भींख मांगने पर ये हो जाते है मजबूर,*
*दिन रात की तपन सहते है ये बेकसूर...✍*
*क्यों अपना समझ कोख मे पलने है देते,*
*दर बदर को भटकने बाहर है छोड़ देते...✍*
*अनाथो ने क्या पाप किया है ये कहदो,*
*प्यार दुलार सम्मान इन्हें भी कुछ देदो...✍*
*ना तन पर कपड़ा और फटी होती लंगोट,*
*बीमार पड़े रहते है ये लगने पर भी चोट...✍*
*ना पैसो की खनखन ना होता अनाज साथ,*
*पेट भर खा नही पाते और ना देता कोई हाथ...✍*
*तिरस्कार गालियाँ और मार की बौछार,*
*बेवजह कर देते है हम सब इनपर उतार...✍*
*काश अन्न का निवाला इन्हें खिला पाते,*
*कुछ पल की खुशियाँ शायद हम दे पाते...✍*
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