*छोटे कपड़े पहन रही है आज लड़कियाँ,*
*कहते है इसलिये होता आज है बलात्कार;*
*आठ साल की बच्ची को भी मैं ये बतादो,*
*दे दूँ क्या साड़ी पहनने का भी ये संस्कार...!*
*जनम लेते ही क्या उसे मैं बुरखा पहना दूँ,*
*या छीन लूँ उससे स्वतंत्र जीने का अधिकार;*
*निर्दयता से उसका पालन पोषण करूँ मैं,*
*या सिखादूँ मैं बचपन से सहना तिरस्कार..!*
*छोटी सी बच्ची का किस तरह पालन करूँ मैं,*
*सुरक्षा का कैसै कलयुग में उसे आधार दू मैं;*
*कोख से बाहर आ गई धरती पर ये बतादो,*
*किस तरह उसकी सुरक्षा का आगाज करूँ मैं...!*
*नवजन्मी बालिका का कैसै सत्कार करूँगी,*
*हो रहे अत्याचार को कैसै मैं स्वीकार करूँगी;*
*अपनी सोच को जब बदल नही पाया है मानव,*
*कोख में आने का अब मैं कैसै आहृवान करूँगी...!*
*ऐ मानव!सर्वप्रथम नेक सोच को स्वीकार कर,*
*बहन बेटी माँ के रिश्ते को हृदय से सत्कार कर;*
*तेरी नेक सोच श्रद्धा भाव हृदय में बसाना होगा,*
*तू नारी के तिरस्कार की सोच का सदा संहार कर...!*
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