देख लुटे है मान मेरा अब,तड़प रही हूँ मैं भारी।
जगह-जगह में छुपे लुटेरे,घेरे है अत्याचारी।।
मैं नारी अवतार हूँ सुनो ,पाप किया मैनै भारी।
बेटी आज है छली जा रही,कितने है अत्याचारी।।
बिलख रही हूँ तड़प रही हूँ,कौन कहे अवतारी हूँ।
मान अगर मैं पाना चाहूँ,समझे बस एक नारी हूँ।।
राह कौन सा अपनाऊँ,कहाँ गुहार लगाऊँ मैं ।
जीना चाहूँ नारी जीवन,दुख को ही बस पाऊँ मैं।।
कलयुग के मानव को देखा,नाबालिग को नोचे है।
देख राक्षस बन बैठे है,मान कौन फिर सोचे है।।
कहाँ खो गयी माँ की ममता,बेटी प्यार भुलाते है।
पापी बनकर आज देख लो,नारी को रूलाते है।।
मुझको कोख में मार गिराना,दुनियाँ में नहिं आना है।
तड़प तड़प के नहिं है जीना ,मुझको मान बचाना है।।
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