*मैनै सोचा ! लिख दूँ क्या मैं अपनी गाथा,*
*कागज़ों पर उतार दूँ क्या स्वयं की व्यथा...✍*
*ना कलम ने लिखने में मेरा साथ दिया*
*और कागज ने भी कलम दरकिनार किया...✍*
*कलम ने कहा क्यों नही है तुझमें धीर,*
*क्यों हो जाती है तू स्वयं इतनी अधीर...✍*
*तू कलम थाम कर कुछ तो लिख सही,*
*स्वयं की गाथा को रख खुद से दूर कहीं...✍*
*तू लिख दें स्वालंबन की ऐसी कहानी,*
*पड़कर हो सदा ही तेरी जग बखानी...✍*
*तू लिख दें स्वाभिमान से सबको लड़ना,*
*प्रेरणा लेकर सीखें सदा आगे ही बड़ना...✍*
*तू लिख दें नारी के सम्मान की रक्षा,*
*स्वयं पर रहे निर्भर बस यही लें शिक्षा...✍*
*तू लिख नेक कर्म कर्तव्य को करना,*
*मानवता की राह पर निरंतर चलना...✍*
*तू लिख दें कागज पर ऐसी कहानी,*
*सुधर जाए सबकी मानव जिन्दगानी...✍*
*तू लिख दें अत्याचार पर ऐसा विरोध,*
*ना होगा राह में कभी भी कोई अवरोध...✍*
*लिख तू अनाथ ना करने की कहानी,*
*भ्रूण हत्या ना कर नारी जाति है बचानी...✍*
*तू लिख दें जाति-पाति का ना बंधन हो,*
*सबमें प्यार एकता का सदा ही संगम हो...✍*
*लिख तू धँरा में हो शांति का प्रतीक,*
*अमन चैन सुकुन में जीवन हो व्यतीत...✍*
*थामा जो तुमने प्रेरणा का दामन सदा,*
*कागज कलम ही होती है सबकी विद्या...✍*
*हर राह पर कलम तुझे खड़ा मिलेगा,*
*कागज का साथ ना कभी तेरा छूटेगा...
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