Saturday, 4 August 2018

आशा की कविता....माँ आज मुझे अपने कोख में ही मार दे

माँ आज मुझे अपने कोख में ही मार दे,
कलयुग का ना ये मुझको अत्याचार दे;
खून के आँसू देख आज पी रही हू मैं,
कोख में ही मारकर नारी को तू तार दे।😢

मैं नन्हीं सी एक सुंदर कली हूँ देख माँ,
शब्दों का उच्चारण कर नही पायी हूँ माँ;
नारी समझकर वेहसी बन रहे है कुछ लोग,
कोख में ही मार कर मेरा उद्धार करो माँ।😢

सब कहते है पाप है भ्रूण हत्या करना,
आज कुकृत्य को पड़ रहा है ऐसे सहना;
कष्ट ना होगा माँ जो कोख में ही मर जाऊँ,
दरिंदगी फैल रही अब कुछ नही है कहना।😢

आज देखो भारत का झंडा हाथों में लेकर,
बलात्कारियो को बेशर्म अपना साथ देकर;
बचाने निकल पड़े है अब तो सारे पापी देखो,
वे भी तो देखें जरा अस्मत की पीड़ा सहकर।😢

नेताओ का आज हृदय कहा रह गया है,
ऐसी दरिंदगी से आम आदमी सहम गया है;
भारत में आज लुट रहा है नारी का सम्मान ,
आज का प्रजातंत्र बस सत्ता पर थम गया है।😢

आज दुखदायी पीड़ा मैं जो ऐसे सह रही हूँ,
अन्तःमन की तड़प से घुट-घुट के मर रही हूँ;
कोख में नारी का अस्तित्व ही मिटादो माँ,
एक बाला के लिए यही प्रार्थना कर रही हूँ।😢

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