Sunday, 31 May 2020

दोहा गीत

दोहा गीत

किसानों की पीड़ा

इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान
उपजाते है अन्न को,सबके ये भगवान।

आज दुर्दशा देखलें,नित्य बहाते नीर
आय नही है क्या करें,कितना सहते पीर
कठिन तपस्या ये करे,होता बचत न धान
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान

फसल मेहनत से उगे,मिलता उचित न मोल
लाभ कहाँ से होय अब,कम में लेते तोल
चुप बैठी सरकार है,खोया है सम्मान
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान

करते मेहनत रोज ये,कितना सहते धूप
कितना सहते कष्ट ये,इनका कार्य अनूप
दुख पीड़ा भरमार है,इससे सब अंजान
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान

नही गुजारा आज तो,रोता है परिवार
वंचित है सब लाभ से,सुने नही सरकार
खेत बेचकर जी रहे,देती कुछ नहिं अनुदान
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान

फाँसी पर है झूलते,बढ़ता जाता कर्ज।
सुने नही सरकार ये,नही निभाती फर्ज
व्याकुल हुये किसान अब,मुश्किल में है जान
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान

चौपाई छंद गीत

चौपाई छंद - आशा आजाद

छंद दिवस ला आज मनाबो,बछर पाँचवा के गुन गाबो।
शुभदिन देखौ आज कहाये,छंद छंद मा मन ह रमाये।।

छंद छ के मैं बात बतावौं,सुग्घर ओखर गुन ला गावौं।
गुरुगुल ये कक्षा कहलावै,रहि रहि निसदिन गुन ला गावै।।

छंद छ के सब नींव ल जानौ,दो हजार सोलह हे मानौ।
जिला भिलाई के गुन गावै,पहल उहा ले होये हावै।।

छंद ज्ञान गुरु नांव धरौं जी,अरुण निगम के पाँव परौं जी।
हिरदे निरमल बोलै बानी,छंद विधा के ओहे ज्ञानी।।

छंद साधना रोज करै जी,ज्ञान ध्यान अनमोल धरै जी।
साधक मन के गुन हे भारी,छंद ज्ञान हावै हितकारी।।

छंद आनलाइन मा होवै,कक्षा मा सब निसदिन खोवै।
नियम धरम के पालन होथे,सीखय नइ ओ कक्षा खोथे।

छंद म नइ हे लापरवाही,कक्षा ले बाहिर ओ जाही।
होवै गुरुकुल ले उजियारा,साधक मन के हावै प्यारा।।

छंद गीत अउ सुग्घर गोष्ठी,भरथे छंद खजाना कोठी।
जिनिस जिनिस के छंद लिखाये,सबके मन ला अब्बड़ भाये।।

छंद सीखना अब्बड़ भारी,बनथे गुरु सब बारी बारी।
सुग्घर हावै भाईचारा, दीदी भैया इही अधारा।।

छंद हवे छत्तीसगढ़ी ये,पढ़ही सब अगला पीढ़ी ये।
जुग जुग के हवे चिन्हारी,छत्तीसगढ़ ह हे महतारी।।

छंद म सौ साधक मन हावै,रोज अभ्यास कर जँचवावै।
सत्तर अस्सी छंद सिखाये,सुघर व्यवहार गुरु अपनावै।।

छंद भाव मा सबो छंदाये,साधक मन के हिरदे भाये।
अरुण निगम संस्थापक हावै,अपन माथ ला सबो नवावै।।

रचनाकार - आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़

रोला छंद-नारी

           रोला छंद
नारी है अवतार

नारी है अवतार,हृदय में इसे बसाएँ।
जगती का आधार,प्रेम के पुष्प चढ़ाएँ।
जीवन का उद्धार,जन्म देकर करती है।
मुश्किल कितनी राह,कर्म से ये बढ़ती है।

कभी बहन बन जाय,प्रेम से घर को रखती।
दुख की होवें छाँव,धर्म के पथ पर चलती।
देती हरपल साथ,हाल कैसा भी होवें।
मात पिता का भार,प्रेम से मिलकर ढोवें।

बेटी फर्ज निभाय,काज में हाथ बँटाती,
सबका रखती ध्यान,प्रेम से धर्म निभाती,
मात पिता का ध्यान,करे दे सेवा भारी।
दुख सुख सह परिवार,निभाये वो है नारी।।

पत्नी बनकर धर्म, निभाती है ये मानो।
पालन पोषण रोज,कर्म करती पहचानो।
सँभालती परिवार,श्रेय सब जाता इनको।
देवी का वरदान,दुखाना कभी न मन को।

घर की होती नींव,यही है श्रेष्ठ सहारा,
नारी जीवन सार,एक है यही अधारा।
रिश्तें रखती थाम,प्यार ममता बरसाती।
एकसूत्र में बाँथ,प्रेम का पाठ पढ़ाती।।

रचनाकार-आशा आजाद
कोरबा छत्तीसगढ़

तातक छंद गीत

गीत

अनुशासन का पालन करलें

अनुशासन के पालन से ही,नवपरिवर्तन आएगा।
डरो नही अब कोरोना से,रोग दूर हो जाएगा।

मिथ्या बातें छोड़ सभी को,मानवता को लाना है,
सर्तकता का ध्यान धरें ये,नित्य हमें अपनाना है,
जब अनुशासित मानुष होगा,किटाणु पनप न पाएगा,
अनुशासन के पालन से ही,नवपरिवर्तन आएगा।

देह संक्रमित कभी न होवें,सब रहे सावधानी से ,
सेनेटाइज रखना होगा,भूल न हो नादानी से,
घर के अंदर स्वस्थ रहेगें,हिम्मत मुक्त कराएगा।
अनुशासन के पालन से ही,नवपरिवर्तन आएगा।

अंतस मन से प्रण ये करलो,जड़ से रोग मिटाएगें,
अनुशासित रहकर हम सारे,रिश्तें सभी निभाएगें,
नवपरिवर्तन तब होगा जब,मन में सोच समाएगा,
अनुशासन के पालन से ही,नवपरिवर्तन आएगा।

करना दृणसंकल्प हमें ये,हम ही भारतवासी है,
हर मुश्किल से लड़ जाते है,हम ही मथुरा कासी है,
घर परिवार सुरक्षित होगा,तब ही ये जग भाएगा,
अनुशासन के पालन से ही,नवपरिवर्तन आएगा।

खाँसी हो बुखार जकड़ ले,डाक्टर को बतलाना है,
खतरनाक वायरस न घेरे,हमको मास्क लगाना है,
अनुशासन के रोक से सुनलें,स्वस्थ देश कहलाएगा,
अनुशासन के पालन से ही,नवपरिवर्तन आएगा।

छंदकार-श्रीमती आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़

गीतिका

गीतिका

आधार छंद-आनंद वर्धक
2122 2122 212

आज घर से बाहर नही जाइए
फैलता यह रोग दूर भगाइए ।

लाकडाउन पालन करें ध्यान से,
नियम मानें औ इसे अपनाइए,

लोग सेनेटाइज रहे ज्ञान लें,
वायरस घेरे नही नित्य बताइए।

मास्क रखलें हानि का संज्ञान लें,
संक्रमित होवें नही समझाइए।

छोड़ मिथ्या बात सारे जागिए।
हो सुरक्षा यह सभी सिखलाइए,

दैनिक पत्रिका लोकसदन

दैनिक लोकसदन पत्रिका में नित्य प्रथम पृष्ठ पर सम्मान
22,23,24.05.2000

कविता


*कोरोना से वार्तालाप*

वर्तमान में ये कौन घुस आया
बिना मेरे अनुमति के
घर का ताला तोड़
आकर कहर बरपाया।
उसने कहा,
घुसने की अनुमति
तुझसे क्या लेना आशा
मैं तो स्थापित भारतवासियों
के साथ शान से,
महामारी को भारत के
अंदर ले आया,
कोविड उन्नीस का नाम
मुझे है भाया।
कोरोना का नाम
विश्व में लिखवाया।
मैं चीन की नई खोज हूँ
बीमारी संक्रमित है
जो स्पर्श मात्र से
तन को तोड़ देती है,
मनुज की जान
क्षण भर में ही लेती है
भारत सुरक्षित बचा हुआ था
मैं संक्रमित करने की
दिशा खोज रहा था।
जो मानव स्थापित थे वो
भारत में आकर सुरक्षित है।
परदेश में तो मृत्यु तांडव
कर रहा है
खतरनाक वायरस से
चीन वुहान क्या..?
सारा देश पीड़ा सह रहा है।
भारत में ज्ञान का भंडार है
फिर अहं को बसाकर
परदेश में पल रहे है।
सुख शांति तो भारत में बसता है
आज कोरोना ने सताया तो
भारत देश याद आ रहा है
जन्म लिया देश में,
कर्म करता विदेश में।
आर्थिक स्थिति सुधार रहा है
भारत का मानुष वहाँ
और देश के कर्तव्य को भूल रहा है
देश का भोजन न भाए उन्हें
अधपका भोजन सुहाए उन्हें
यही भारत की है विडंबना
जन्मभूमि को भूलकर,
कर्मभूमि भारत से परे
ऐ देसवासियों
अब तो सुधर जाओ
नही तो मैं तुम्हारे साथ
चला आऊँगा
और कहर बरपाऊँगा।

रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़







मणिमाला छंद

    -----मणिमाला -------
उन्नविंशत्याक्षरावृति
गण संयोयन --- स ज ज भ र स ल
112-121-121-211,-212 -112 -1
यति-- (12 ,7 )


सब एक है सब नेक है यह,देश तो अभिमान।
मिल गाइए सब गान को हम,राग मे यह जान।
रख प्रेम की नित भावना हम,छेड़ दें यशगान।
बढ़ते चले सुरताल में सब,ज्ञान हो नित दान।।

अपनी धरा अपनी नदी यह,ये करे उपकार।
पलते यही हम शान से नित,ज्ञान है भरमार।
यह देश भारत मान है शुभ,एकता पहचान।
करते चले नव काज सुंदर,जानलो यह शान।।

दोहा गीत

दोहा गीत

कभी अशुभ बोलें नहीं,हो जाता आह्वान।
अपना हृदय पवित्र हो,ये ही सच्चा ज्ञान।।

स्वयं आप में झाँकियें,कैसा है व्यवहार,
धर्म कर्म की राह पर,किया कभी उद्धार,
स्वयं प्रशंसा आप कर,रखते झूठा शान,
कभी अशुभ बोलें नहीं,हो जाता आह्वान।।

औरौं के भी झूठ पर,सदा दिखाएँ राह,
मृदुवाणी ही बोलिए,कभी न होवें डाह,
सबसे बढ़कर बोल है,इसका ही है मान,
कभी अशुभ बोलें नहीं,हो जाता आह्वान।।

जैसी भाषा चाहते,बोलें वैसै बोल,
इस जीवन में जान लें,शब्द शब्द अनमोल,
निर्मलता के भाव से,सबको दें सम्मान,
कभी अशुभ बोलें नहीं,हो जाता आह्वान।।

ईश्वर ने गढ़ कर हमें,डाले समान भाव,
कड़वी भाषा बोलकर,रहते स्वयं तनाव,
मानुष अब भी वक्त है,रख भाषा का भान,
कभी अशुभ बोलें नहीं,हो जाता आह्वान।।

रचनाकार-आशा आजाद
कोरबा छतीसगढ़

Thursday, 21 May 2020

अमृतध्वनि छंद

आशा की अमृत वाणी

अमृतध्वनि छंद

मानव अपने हृदय में,बसा रखा है लोभ,
रोज दिखावा कर रहा,कभी न करता क्षोभ,
कभी न करता-क्षोभ कर्ज में,डूबा रहता,
करे दिखावा,व्यर्थ काज पर,खर्चा करता,
आशा कहती,लोभ मोह में,बनता दानव,
श्रेष्ठ कर्म को,धारण करता,सच्चा मानव।

चादर छोटी पड़ रही,किया खर्च जो व्यर्थ,
मनुज भूलता जा रहा,जीवन का क्या अर्थ,
जीवन का क्या-अर्थ लोभ से,कुछ नहिं हासिल,
सदा संतोष,हृदय भाव में,होवें सामिल,
आशा कहती,जीवन का सब,करलें आदर,
खर्च करे सब,उतना जितना,होवें चादर।

मन से ईष्या त्याग दें,चुनें कर्म आधार,
क्षण भर की है जिंदगी,बने संतोष सार,
बने संतोष-सार हृदय का,लालच त्यागें,
कर देता है,नष्ट सोच अब,मानुष जागें,
आशा कहती,कर्म सभी को,करे लगन से
सत् पथ थामें,अहम मिटाये,अपने मन से।

सुंदर भाग्य तब बने,मन में हो विश्वास,
नेक कर्म की चाह पर,लक्ष्य मिले है पास,
लक्ष्य मिले है-पास कठिन तप,मानुष करता,
जिज्ञासा रख,ज्ञान ध्यान से,आगे बढ़ता,
आशा कहती,लगन भावना,मन के अंदर,
ज्ञान ध्यान से,आप बनेगा,भाग्य सुंदर।

संकट की यह आपदा,करता है बेहाल,
बना आज ये देश में,कोरोना का काल,
कोरोना का-काल रोग ये,कैसा आया,
जन जन पर ये,कहर वायरस,है बरपाया
आशा कहती,धारण करलें,तन पर कंकट,
अनुशासन का,पालन करके,टालें संकट।।

विपदा की यह है घड़ी,तड़प रहे मजदूर
भारत का हर नागरिक,हृदय भाव से शूर
हृदय भाव से-शूर कषट वे,झेल रहे है,
आर्थिक तंगी,कष्ट सभी जन,आज सहे है,
आशा कहती,काज करे नव,शासन उम्दा,
दीन दुखी का,पीर हरे जो,छाई विपदा।

रखकर करुणा भाव को,हृदय भाव के मध्य
दीन दुखी का साथ दें,हो सबका यह लक्ष्य,
हो सबका यह-लक्ष्य राह हम,सुंदर चुनलें,
पीर सताये,दीन दुखी को,उसको हर लें,
आशा कहती,नेकी करलें,हम सब मिलकर,
जनहित का हम,काज करें मन,सुंंदर रखकर।

रखकर मानवता सभी,नित्य करें आगाज,
प्रेम भाव आधार से,करें देशहित काज,
करें देशहित-काज पुण्य पथ,चुनना हमको,
हम ही सच्चे,भारतवासी,गढ़ना सबको
आशा कहती,लोग प्रेरणा,लेंगे पथ पर,
पहल करें हम,हृदय भाव को,निर्मल रखकर।

ममता निश्छल है बहे,देती जीवन दान,
माँ अनुपम वरदान,इस जगती की शान,
इस जगती की-शान ज्ञान है,हर क्षण देती,
सेवा करती,माँ बदले में ,कुछ न लेती,
आशा कहती,स्नेह बाँटती,रखती समता,
सुख दुख सहती,निर्मल होती,माँ की ममता।

ममता की मूरत कहें,जीवन का आधार,
दया भाव रखती सदा,होता निर्मल प्यार,
होता निर्मल-प्यार जगत है,माँ से चलता,
हर जीवन है,माँ के आँचल,में ही पलता,
आशा कहती,बरसाती है,नित्य मधुरता,
हर मुश्किल से,हमें बचाती,माँ की ममता।

Wednesday, 6 May 2020

रुप घनाक्षरी

रुप घनाक्षरी

दीन हीन की दशा को,समझे न कोई प्राणी,
भूख से ये मर रहे,सह रहे अपमान।
अन्न कहाँ से ये लाएँ,कैसै गरीब मुस्काये।
भर पेट खाना नही,करे नही अभिदान,
भोजन कहाँ से पाएँ,रोजी से नही गुजारा,
व्याकुल गरीब सारे,नही लेता कोई भान।
तिल तिल मरते है,पीड़ा नित्य सहते है,
भारत की गरीबी का,रखें कुछ तो संज्ञान।

मंदिरों में धन देखो,चड़ावा करोड़ होता,
दीन हीन भूखें मरे,गरीब का बुरा हाल।
ईश कहाँ धन माँगे,दान को अथाह देते,
गरीब की पीड़ा हरे,पड़े आज जो बेहाल।
भारत गरीब नही,देश का ये हाल देखो,
मंदिरों के घन से भी,करें उन्हें खुशहाल।
हम है भारतवासी,कष्ट हमें हरना है,
जनहित का हमें ही,रखना है अब ख्याल।

रचनाकार-आशा आजाद
कोरबा छत्तीसगढ़

Tuesday, 5 May 2020

आलेख,कोरोना संकट एंव पर्यावरण

कोरोना संकट एंव पर्यावरण

        कोरोना वायरस से पैदा हुई महामारी ने वैश्विक समाज और प्रशासन की तमाम कमजोरियों को उजागर कर दिया है और साथ ही इस खतरनाक संकट से आगे बढ़ने का रास्ता भी दिखाया है ।कोविड 19 की यह खतरनाक बीमारी जो असमय ही मनुष्य जीवन पर हावी हो गया है, ऐसा संकट जो मनुष्य जाति को क्षणभर में नष्ट कर सकता है यह संकट मानव जीवन को आर्थिक विकास,सामाजिक,राजनीतिक सभी दृष्टि से प्रभावित कर रही है।यदि लाकडाउन जैसी स्थिति लंबे समय तक रहेगी तो दुनिया में निराशा,तनाव,चिंता जैसी गंभीर मानसिक बीमारियों की बाढ़ आ जाएगी जो व्यक्तिगत ही नहीं वरन दुनिया में सामाजिक, आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न हो जाएगी।कोरोना बीमारी से प्रभाव से कम अपितु आर्थिक समस्याओं के भार से मनुष्य की मनोदशा बिगड़ जाएगी।
      यह कोरोना काल विश्व के लिए एक ऐसा संकट है जो भविष्य को सोजन के लिए विवश कर दिया है, कोरोना वायरस का संक्रमण से पूरी दुनिया थम सी गई है स्कूल-कॉलेज उसे लेकर यात्राओं पर प्रतिबंध लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी और इस पाबंदी से मानव किसी ना किसी तरह प्रभावित हो रहा है। एक बीमारी के खिलाफ बेजोड़ वैश्विक प्रतिक्रिया है प्रश्न यह भी उठता है कि क्या लाकडाउन समाप्त होने पर भी आम जिंदगी में पुनः वापसी हो पाएगी ? क्या इस भयावह बीमारी से हुए लोग लाकडाउन से पूरी अर्थव्यवस्था थम गई है उसे भुलाकर स्वतंत्र होकर सामान्य जिंदगी व्यतीत कर पाएंगे ?
दूसरे पक्ष में यदि लंबे समय तक सभी स्थितियों में प्रतिबंध हो तो सामाजिक और आर्थिक नुकसान विध्वंसकारी हैं। प्रतिबंध समाप्त होने पर भी मानव जीवन पर यह संकट पूर्णतः संकट से संक्रमित होने के कारण अनजाने में लोगों की रोग प्रतिरोधक शक्ति भी बढ़ सकती है किंतु इसे होने में काफी समय लग सकता है इसके लिए हमें सतर्कता का ध्यान रखकर हमें दूसरों के स्वास्थ्य पर भी कुछ ध्यान देना होगा जो हमारे इर्द-गिर्द अधिकतर रहते हैं, इससे इस संकट को दूर करने में हमारी कुछ भागीदारी हो सकती है। यह संकट इतनी जल्दी समाप्त होने की कगार पर नहीं है इसलिए वैक्सीन बन जाने के उपरांत भी हमें सावधानी के साथ जीवन व्यतीत करना होगा यदि दो या दो से अधिक सालों तक यह लाकडाउन जारी रहता है तो देश का एक बड़ा हिस्सा संक्रमित हो जाएगा ।
        विकास की अंधी दौड़ में धरती के पर्यावरण का हमने जो हाल किया है वह बीते करीब चार दशक से चिंता का विषय तो बना है लेकिन विकसित देश अपनी जिम्मेदारी निभाने की बजाय विकासशील देशों पर हावी होने के लिए इस्तेमाल करते है और विकासशील देश भी विकसित देशों के रास्ते पर चलकर पर्यावरण नष्ट करने के अभियान में शामिल हो गया है। पृथ्वी सम्मेलन के 28 साल बाद भी हालात जस के तस ही थे लेकिन कोरोना महामारी से भयंकर समूचे विश्व में लोगों ने पर्यावरण को स्वस्थ होने का अवसर दे दिया है।हवा का जहर क्षीण हो गया है और नदियों का जल निर्मल हो गया है भारत में जिस गंगा को साफ करने के अभियान कई साल से चल रहे थे और बीते 5 साल में भी करीब 20000 करोड रुपए खर्च करने पर भी साधारण सफलता नहीं दिख रही थी उसी गंगा का लॉकडाउन ने निर्मल बना दिया उसी तरह चंडीगढ़ के हिमाचल में हिमालय की चोटियां दिखने लगी है। औद्योगिक आय की दर जरूर 7 फ़ीसदी से 2 फ़ीसदी पर आ गिरी है अर्थव्यवस्था खतरे में है,लेकिन यही समय है कि पूरी दुनिया पर्यावरण और विकास के संतुलन पर उतनी ही गंभीरता से सोचे जितना वर्तमान में कोरोना संकट से निपटने की सोच रही है।

आशा आजाद
कोरबा छत्तीसगढ़

गीत

गीत

सृजन भाव आधार बनाएँ,
            भावों का हम गुनगान करें।
काव्य कुंज में कवि मन कुहके,
             सम्मोहित हो रसपान करें।

सृजन सदा नव आलोकित हो,
               नेकी का सुंदर भाव पले।
ज्ञान आदर्श हृदय समाये,
          कर्म बनाकर जन साथ चले।
दीन हीन का उद्धार करें,
           मनुज धर्म का आह्वान करें।
काव्य कुंज में कवि मन कुहके,
             सम्मोहित हो रसपान करें।

सृजन आत्म मंथन जब होगा,
            अंधकार फिर मिटेंगे सभी।
ज्योत प्रेरणा की जागेगी,
             द्वेष पनप न पाएगा कभी।
मिथ्या सूचक संदेश न हो
              सुंदर नव मंगल गान करें।
काव्य कुंज में कवि मन कुहके,
             सम्मोहित हो रसपान करें।

मृदुवाणी और मधुरता से,
           कलम सदैव ही सुगंधित हो।
निर्मलता हो और गहनता,
        सृजन करें वह भी साधित हो।
ज्ञान संचार हो लेखन में,
        जनहित का सब उत्थान करें।
काव्य कुंज में कवि मन कुहके,
           सम्मोहित हो रसपान करें।

रचनाकार-आशा आजाद
कोरबा छत्तीसगढ़