दोहा गीत
किसानों की पीड़ा
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान
उपजाते है अन्न को,सबके ये भगवान।
आज दुर्दशा देखलें,नित्य बहाते नीर
आय नही है क्या करें,कितना सहते पीर
कठिन तपस्या ये करे,होता बचत न धान
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान
फसल मेहनत से उगे,मिलता उचित न मोल
लाभ कहाँ से होय अब,कम में लेते तोल
चुप बैठी सरकार है,खोया है सम्मान
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान
करते मेहनत रोज ये,कितना सहते धूप
कितना सहते कष्ट ये,इनका कार्य अनूप
दुख पीड़ा भरमार है,इससे सब अंजान
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान
नही गुजारा आज तो,रोता है परिवार
वंचित है सब लाभ से,सुने नही सरकार
खेत बेचकर जी रहे,देती कुछ नहिं अनुदान
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान
फाँसी पर है झूलते,बढ़ता जाता कर्ज।
सुने नही सरकार ये,नही निभाती फर्ज
व्याकुल हुये किसान अब,मुश्किल में है जान
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान
उपजाते है अन्न को,सबके ये भगवान।
आज दुर्दशा देखलें,नित्य बहाते नीर
आय नही है क्या करें,कितना सहते पीर
कठिन तपस्या ये करे,होता बचत न धान
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान
फसल मेहनत से उगे,मिलता उचित न मोल
लाभ कहाँ से होय अब,कम में लेते तोल
चुप बैठी सरकार है,खोया है सम्मान
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान
करते मेहनत रोज ये,कितना सहते धूप
कितना सहते कष्ट ये,इनका कार्य अनूप
दुख पीड़ा भरमार है,इससे सब अंजान
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान
नही गुजारा आज तो,रोता है परिवार
वंचित है सब लाभ से,सुने नही सरकार
खेत बेचकर जी रहे,देती कुछ नहिं अनुदान
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान
फाँसी पर है झूलते,बढ़ता जाता कर्ज।
सुने नही सरकार ये,नही निभाती फर्ज
व्याकुल हुये किसान अब,मुश्किल में है जान
इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान
