Sunday, 31 May 2020
कविता
*कोरोना से वार्तालाप*
वर्तमान में ये कौन घुस आया
बिना मेरे अनुमति के
घर का ताला तोड़
आकर कहर बरपाया।
उसने कहा,
घुसने की अनुमति
तुझसे क्या लेना आशा
मैं तो स्थापित भारतवासियों
के साथ शान से,
महामारी को भारत के
अंदर ले आया,
कोविड उन्नीस का नाम
मुझे है भाया।
कोरोना का नाम
विश्व में लिखवाया।
मैं चीन की नई खोज हूँ
बीमारी संक्रमित है
जो स्पर्श मात्र से
तन को तोड़ देती है,
मनुज की जान
क्षण भर में ही लेती है
भारत सुरक्षित बचा हुआ था
मैं संक्रमित करने की
दिशा खोज रहा था।
जो मानव स्थापित थे वो
भारत में आकर सुरक्षित है।
परदेश में तो मृत्यु तांडव
कर रहा है
खतरनाक वायरस से
चीन वुहान क्या..?
सारा देश पीड़ा सह रहा है।
भारत में ज्ञान का भंडार है
फिर अहं को बसाकर
परदेश में पल रहे है।
सुख शांति तो भारत में बसता है
आज कोरोना ने सताया तो
भारत देश याद आ रहा है
जन्म लिया देश में,
कर्म करता विदेश में।
आर्थिक स्थिति सुधार रहा है
भारत का मानुष वहाँ
और देश के कर्तव्य को भूल रहा है
देश का भोजन न भाए उन्हें
अधपका भोजन सुहाए उन्हें
यही भारत की है विडंबना
जन्मभूमि को भूलकर,
कर्मभूमि भारत से परे
ऐ देसवासियों
अब तो सुधर जाओ
नही तो मैं तुम्हारे साथ
चला आऊँगा
और कहर बरपाऊँगा।
रचनाकार - श्रीमती आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
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