कोरोना संकट एंव पर्यावरण
यह कोरोना काल विश्व के लिए एक ऐसा संकट है जो भविष्य को सोजन के लिए विवश कर दिया है, कोरोना वायरस का संक्रमण से पूरी दुनिया थम सी गई है स्कूल-कॉलेज उसे लेकर यात्राओं पर प्रतिबंध लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी और इस पाबंदी से मानव किसी ना किसी तरह प्रभावित हो रहा है। एक बीमारी के खिलाफ बेजोड़ वैश्विक प्रतिक्रिया है प्रश्न यह भी उठता है कि क्या लाकडाउन समाप्त होने पर भी आम जिंदगी में पुनः वापसी हो पाएगी ? क्या इस भयावह बीमारी से हुए लोग लाकडाउन से पूरी अर्थव्यवस्था थम गई है उसे भुलाकर स्वतंत्र होकर सामान्य जिंदगी व्यतीत कर पाएंगे ?
दूसरे पक्ष में यदि लंबे समय तक सभी स्थितियों में प्रतिबंध हो तो सामाजिक और आर्थिक नुकसान विध्वंसकारी हैं। प्रतिबंध समाप्त होने पर भी मानव जीवन पर यह संकट पूर्णतः संकट से संक्रमित होने के कारण अनजाने में लोगों की रोग प्रतिरोधक शक्ति भी बढ़ सकती है किंतु इसे होने में काफी समय लग सकता है इसके लिए हमें सतर्कता का ध्यान रखकर हमें दूसरों के स्वास्थ्य पर भी कुछ ध्यान देना होगा जो हमारे इर्द-गिर्द अधिकतर रहते हैं, इससे इस संकट को दूर करने में हमारी कुछ भागीदारी हो सकती है। यह संकट इतनी जल्दी समाप्त होने की कगार पर नहीं है इसलिए वैक्सीन बन जाने के उपरांत भी हमें सावधानी के साथ जीवन व्यतीत करना होगा यदि दो या दो से अधिक सालों तक यह लाकडाउन जारी रहता है तो देश का एक बड़ा हिस्सा संक्रमित हो जाएगा ।
विकास की अंधी दौड़ में धरती के पर्यावरण का हमने जो हाल किया है वह बीते करीब चार दशक से चिंता का विषय तो बना है लेकिन विकसित देश अपनी जिम्मेदारी निभाने की बजाय विकासशील देशों पर हावी होने के लिए इस्तेमाल करते है और विकासशील देश भी विकसित देशों के रास्ते पर चलकर पर्यावरण नष्ट करने के अभियान में शामिल हो गया है। पृथ्वी सम्मेलन के 28 साल बाद भी हालात जस के तस ही थे लेकिन कोरोना महामारी से भयंकर समूचे विश्व में लोगों ने पर्यावरण को स्वस्थ होने का अवसर दे दिया है।हवा का जहर क्षीण हो गया है और नदियों का जल निर्मल हो गया है भारत में जिस गंगा को साफ करने के अभियान कई साल से चल रहे थे और बीते 5 साल में भी करीब 20000 करोड रुपए खर्च करने पर भी साधारण सफलता नहीं दिख रही थी उसी गंगा का लॉकडाउन ने निर्मल बना दिया उसी तरह चंडीगढ़ के हिमाचल में हिमालय की चोटियां दिखने लगी है। औद्योगिक आय की दर जरूर 7 फ़ीसदी से 2 फ़ीसदी पर आ गिरी है अर्थव्यवस्था खतरे में है,लेकिन यही समय है कि पूरी दुनिया पर्यावरण और विकास के संतुलन पर उतनी ही गंभीरता से सोचे जितना वर्तमान में कोरोना संकट से निपटने की सोच रही है।
आशा आजाद
कोरबा छत्तीसगढ़
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