रुप घनाक्षरी
दीन हीन की दशा को,समझे न कोई प्राणी,
भूख से ये मर रहे,सह रहे अपमान।
अन्न कहाँ से ये लाएँ,कैसै गरीब मुस्काये।
भर पेट खाना नही,करे नही अभिदान,
भोजन कहाँ से पाएँ,रोजी से नही गुजारा,
व्याकुल गरीब सारे,नही लेता कोई भान।
तिल तिल मरते है,पीड़ा नित्य सहते है,
भारत की गरीबी का,रखें कुछ तो संज्ञान।
मंदिरों में धन देखो,चड़ावा करोड़ होता,
दीन हीन भूखें मरे,गरीब का बुरा हाल।
ईश कहाँ धन माँगे,दान को अथाह देते,
गरीब की पीड़ा हरे,पड़े आज जो बेहाल।
भारत गरीब नही,देश का ये हाल देखो,
मंदिरों के घन से भी,करें उन्हें खुशहाल।
हम है भारतवासी,कष्ट हमें हरना है,
जनहित का हमें ही,रखना है अब ख्याल।
रचनाकार-आशा आजाद
कोरबा छत्तीसगढ़
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