दोहा गीत
कभी अशुभ बोलें नहीं,हो जाता आह्वान।
अपना हृदय पवित्र हो,ये ही सच्चा ज्ञान।।
स्वयं आप में झाँकियें,कैसा है व्यवहार,
धर्म कर्म की राह पर,किया कभी उद्धार,
स्वयं प्रशंसा आप कर,रखते झूठा शान,
कभी अशुभ बोलें नहीं,हो जाता आह्वान।।
औरौं के भी झूठ पर,सदा दिखाएँ राह,
मृदुवाणी ही बोलिए,कभी न होवें डाह,
सबसे बढ़कर बोल है,इसका ही है मान,
कभी अशुभ बोलें नहीं,हो जाता आह्वान।।
जैसी भाषा चाहते,बोलें वैसै बोल,
इस जीवन में जान लें,शब्द शब्द अनमोल,
निर्मलता के भाव से,सबको दें सम्मान,
कभी अशुभ बोलें नहीं,हो जाता आह्वान।।
ईश्वर ने गढ़ कर हमें,डाले समान भाव,
कड़वी भाषा बोलकर,रहते स्वयं तनाव,
मानुष अब भी वक्त है,रख भाषा का भान,
कभी अशुभ बोलें नहीं,हो जाता आह्वान।।
रचनाकार-आशा आजाद
कोरबा छतीसगढ़
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