Monday, 6 May 2024

प्रदीप छंद-धरा की महिमा


 प्रदीप छंद-धरा की महिमा

वंसुधरा पर जीवन सुंदर, अपना यह आधार हो।
शोभित होवे चहुँओर सदा, ऐसा शुभ  श्रृंगार हो।।

छिपा हुआ भूगर्भ सहत पर, भूजल का भंडार है।
शुद्ध रुप में बहे निरंतर,  यह सुंदर उपहार है ।।

खनिज संपदा बहुत धरा पर, वंसुधरा की शान ये।
लगे जरूरत उतना निकले, कहे धरा यह सार ये ।।

व्यर्थ कभी मत नीर गँवाना, धरती का उपहार है।
रखे संतुलित जड़ चेतन से, धरा रखें सम भार है।।

आज कोयला गर्भ धरा से, खूब निकाले खान है ।
रिक्त जगह को भरते जाएँ, इससे निज उद्धार है।।

वृक्ष न काटें खूब लगाएँ, समझें इसका मोल को।
मानसून है इसपर निर्भर, समझें अनुपम बोल को।।

वन्य जीव व्याकुल है कितने, कितने वे बेचैन है।
कटते जंगल लोभ मोह में, छिनता उनका रैन है।।

वन्य जीव का एकमात्र बस, जंगल ही संसार है।
रैन बसेरा कभी न छींनें, यह भी शुभ व्यवहार है।।

पौधारोपण करें सभी जन, स्वस्थ देह का द्वार है।।
धरा संतुलन बिगड़ा समझें, इसके हम हकदार है ।।

कल का जीवन करें सुरक्षित, धरा मोल को जानिए।
स्वस्थ देह तन रहें निरोगी, गुण सुंदर पहचानिए।।

सरसी छंद - रंगों का मोल


सरसी छंद - रंगों का मोल

कुदरत का वरदान शुभे है, जिसको कहते रंग।
अन्तर्मन को शोभित करती, लाती सदा उमंग।।

अट्ठारह इकसठ में जानें, मैक्सवेल की खोज।
शुभ वर्णों की बारीकी, खोजा उसने रोज।।

श्वेत श्याम बस रंग प्रथम थे, नित्य रंगते चित्र।
वर्तमान में रंग अलौकिक,  अब ये जीवन मित्र।।

मोनोक्रोम प्रथम था पहले, बढ़ी रंग पहचान।
मूल रंग दुनिया में छाई, सुंदर यह अभिदान।।

जनक सप्त रंगों को माना, शोभित अनुपम भाव।
रंग बिरंगी जीवन दिखती,  ऐसा पड़ा प्रभाव।।

नीरस चित्रों में अब भरती, जीवन के सब वर्ण।
चित्र भाव से कविवर कृति, सुनें सभी के कर्ण।।

नारंगी अरु पीला होता, हरा बैंगनी लाल।
रंग आसमानी अरु नीला, हिय प्रिय सभी कमाल।।

वर्ण प्राथमिक कहलाते है, हरा लाल शुभ सार।
नीला सह तीनों क्रम में है, इनका नव आधार।।

वर्ण द्वितीयक को हम जानें, मिश्रित क्रम का रूप।
रानी सियान है अरु नीला, सूचक रंग अनूप।।

वर्ण द्वितीयक भाग हुए दो, गर्म ठंड दो नाम।
मिश्रित रंगो से बन जाता, सुंदर चित्र सुकाम।।

गर्म रंग में लाल नारंगी, पीला अति मन भाय।
शुभे बैंगनी भी इस क्रम में, आँखों को हर्षाय।।

ठंड रंग की बात निराली, पर्ण हरा कहलाय।
शुभे आसमानी सागर पर, सुंदर  वर्ण बनाय।।

भिन्न भिन्न रंगों से धरती, धारे सुंदर वस्त्र।
वर्ण अलौकिक मन को भाए, फैला यह सर्वत्र।।

दोहावली - घट रहा है मेल मिलाप


दोहावली - घट रहा है मेल मिलाप

वर्तमान की जिंदगी, हुई आज अति व्यस्त ।
मोबाइल चहुँओर है, मनुज लीन अरु मस्त ।।

आज दूरियाँ बढ़ रही, फैला जो यह यंत्र।
मेल मिलाप कम हुए, टूटे बंधन तंत्र।।

कुछ जन लेते लाभ है, करते इसपर कार्य।
कुछ आनंद में लीन है, दिनभर रखते धार्य।।

युवा हमारे देश के, तनिक न रखते भान।
शिक्षा के शुभ ध्येय का, नहीं रखें संज्ञान।।

नहीं ज्ञान को धारते, नेट चेट में लीन।
फोटो फिल्टर में लगे, श्वेत श्याम रंगीन।।

नहीं जीविका ढूँढते, मात पिता पर भार।
डेटा पैक रिचार्ज कर, घटा रहे आधार।।

समय बड़ा बलवान है, आज युवा अंजान।
हँसी ठिठोली कर रहे, छूट रहा शुभ ज्ञान।।

 आज मेहनत छोड़कर, खेल रहें है खेल।
गेम खेल धन चाहिए, व्यर्थ रखें है मेल।।

अंजानों से मेल रख, घर पर करें न बात।
चिंता पालक कर रहे, व्यस्त रहें दिन रात।।

घटता वार्तालाप है, मोबाइल का दौर।
मेल मिलाप घट रहा, कोई करे न गौर।।

संबंधों के बंध अब, घटते है अब नित्य।
अनाचार घटना बढ़ी, निसदिन जघन्य कृत्य।।

रोगग्रस्त जो हो रहे, कारण यह भी एक।
मोबाइल निज कम चले, वाणी यह है नेक।।

हे जन आज विचारिए, बदलें अपनी चाल।
शुभ दिन नित्य सुधारिए, खुद ही करें कमाल।।


गीतिका- लोकतंत्र का सार लिखें



गीतिका - लोकतंत्र का सार लिखें

लोकतंत्र का पर्व है आया जनहित पथ उत्थान लिखें।
कविवर देशहितों को लिख दें क्या है इसका मान लिखें।

रोजगार की मारामारी युवा भटकते नित आज है,
पढ़ लिखकर भी नहीं नौकरी ये नित्य परेशान लिखें।

बड़ी किसानों की पीड़ा है उनकी पीड़ा सार कहे,
कष्ट भरें उनके जीवन का नेता लें यह भान लिखें ।

अनाचार का क्रम जो फैला राजनीति के खेल में,
लुटती बाला की पीड़ा का चीख चीख सम्मान लिखें।

पेट अगन जो सता रही है पालक बच्चे संग भिड़े,
बाल आज मजदूरी करते देख क्यों अंजान लिखें।

भ्रष्टाचार व्याप्त है इतना कैसे रोकें खेल बुरा,
भ्रष्टाचारी लूट रहे जो जन जन को सत भान लिखें।

लूटपाट है वर्तमान में रिश्तों का अब मोल नहीं,
भाई भाई का दुश्मन है अपनापन है शान लिखें।

मानवता को भूल रहें है खून खराबा फैल रहा,
मुक्ति मिले इन सबसे कविवर वोट महत्ता दान लिखें।

लोकतंत्र का ध्येय न भूलें जीवन जो उद्धार करे,
देशवासियों के हित पथ में संविधान शुभ ज्ञान लिखें।

 व्याप्त मंहगाई से जन आहत भारत का यह हाल यहाँ,
दीनों के जीवन यापन का दुख का कुछ तो गान लिखें।

लोकतंत्र में सत्ता भाए नेता चलते लोभ धरे,
सच्चे पथ पर नेता होवे जनता है भगवान लिखें।