सरसी छंद - रंगों का मोल
कुदरत का वरदान शुभे है, जिसको कहते रंग।
अन्तर्मन को शोभित करती, लाती सदा उमंग।।
अट्ठारह इकसठ में जानें, मैक्सवेल की खोज।
शुभ वर्णों की बारीकी, खोजा उसने रोज।।
श्वेत श्याम बस रंग प्रथम थे, नित्य रंगते चित्र।
वर्तमान में रंग अलौकिक, अब ये जीवन मित्र।।
मोनोक्रोम प्रथम था पहले, बढ़ी रंग पहचान।
मूल रंग दुनिया में छाई, सुंदर यह अभिदान।।
जनक सप्त रंगों को माना, शोभित अनुपम भाव।
रंग बिरंगी जीवन दिखती, ऐसा पड़ा प्रभाव।।
नीरस चित्रों में अब भरती, जीवन के सब वर्ण।
चित्र भाव से कविवर कृति, सुनें सभी के कर्ण।।
नारंगी अरु पीला होता, हरा बैंगनी लाल।
रंग आसमानी अरु नीला, हिय प्रिय सभी कमाल।।
वर्ण प्राथमिक कहलाते है, हरा लाल शुभ सार।
नीला सह तीनों क्रम में है, इनका नव आधार।।
वर्ण द्वितीयक को हम जानें, मिश्रित क्रम का रूप।
रानी सियान है अरु नीला, सूचक रंग अनूप।।
वर्ण द्वितीयक भाग हुए दो, गर्म ठंड दो नाम।
मिश्रित रंगो से बन जाता, सुंदर चित्र सुकाम।।
गर्म रंग में लाल नारंगी, पीला अति मन भाय।
शुभे बैंगनी भी इस क्रम में, आँखों को हर्षाय।।
ठंड रंग की बात निराली, पर्ण हरा कहलाय।
शुभे आसमानी सागर पर, सुंदर वर्ण बनाय।।
भिन्न भिन्न रंगों से धरती, धारे सुंदर वस्त्र।
वर्ण अलौकिक मन को भाए, फैला यह सर्वत्र।।
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