प्रदीप छंद-धरा की महिमा
वंसुधरा पर जीवन सुंदर, अपना यह आधार हो।
शोभित होवे चहुँओर सदा, ऐसा शुभ श्रृंगार हो।।
छिपा हुआ भूगर्भ सहत पर, भूजल का भंडार है।
शुद्ध रुप में बहे निरंतर, यह सुंदर उपहार है ।।
खनिज संपदा बहुत धरा पर, वंसुधरा की शान ये।
लगे जरूरत उतना निकले, कहे धरा यह सार ये ।।
व्यर्थ कभी मत नीर गँवाना, धरती का उपहार है।
रखे संतुलित जड़ चेतन से, धरा रखें सम भार है।।
आज कोयला गर्भ धरा से, खूब निकाले खान है ।
रिक्त जगह को भरते जाएँ, इससे निज उद्धार है।।
वृक्ष न काटें खूब लगाएँ, समझें इसका मोल को।
मानसून है इसपर निर्भर, समझें अनुपम बोल को।।
वन्य जीव व्याकुल है कितने, कितने वे बेचैन है।
कटते जंगल लोभ मोह में, छिनता उनका रैन है।।
वन्य जीव का एकमात्र बस, जंगल ही संसार है।
रैन बसेरा कभी न छींनें, यह भी शुभ व्यवहार है।।
पौधारोपण करें सभी जन, स्वस्थ देह का द्वार है।।
धरा संतुलन बिगड़ा समझें, इसके हम हकदार है ।।
कल का जीवन करें सुरक्षित, धरा मोल को जानिए।
स्वस्थ देह तन रहें निरोगी, गुण सुंदर पहचानिए।।
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