कुकुभ छंद गीत
भारत के सच्चे सेनानी,सबका मान बढ़ाते है,
रण पर कुर्बानी से अपने,झण्डा वो फहराते है।
है शहीद कितने भारत में,कितना रक्त बहाया है,
हिंदुस्तान की शान बान में,मरकर फर्ज निभाया है,
साहस रखकर फर्ज निभाते,दुश्मन मार गिराते है,
रण पर कुर्बानी से अपने,झण्डा वो फहराते है।
घर पर बैठी घरवाली जो,अपना फर्ज निभाती है,
बच्चे उनके नित्य तरसते,पालन श्रेय उठाती है,
हुए वीरगति को सुनकर,अपना होश गवाते है,
रण पर कुर्बानी से अपने,झण्डा वो फहराते है।
जंगल झाड़ी गर्मी सर्दी, तन पर कितना सहते है,
रात रात भर जाग जाग कर,रक्षा सबकी करते है,
हम बैठै है घर पर अपने,सरहद पर सो जाते है,
रण पर कुर्बानी से अपने,झण्डा वो फहराते है।
शत्रु को घुसने ना देते,सीमा पर नजर गड़ाया है,
भूख प्यास का होश कहाँ जब,भारत पर बन आया है,
भारत माता की रक्षा को,लहूँ सदा दे जाते है,
रण पर कुर्बानी से अपने,झण्डा वो फहराते है।
रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
Sunday, 2 February 2020
कुकुभ गीत-दिव्यांग बच्चो के लिए
कुकुभ छंद गीत - दिव्यांग बच्चे
मन के हम है सच्चे सुंदर,अपनी मीठी भाषा है,
नही दिव्यांग मन के सुनलो,मंजिल की अभिलाषा है।
नेक कर्म करने की चाहत,सदा जोश हम रखते है,
नही किसी के पाँव मगर हम,मन से नित हम चलते है
नही कमजोर हाथ नही जो,मन अपनी परिभाषा है,
नही दिव्यांग मन के सुनलो,मंजिल की अभिलाषा है।
भेदभाव को दूर भगाये,सच्चे मन को पहचाने,
मानवता के पथ पर चलना,कर्म समझ अपना जाने,
समता का नित भाव धरें सब, जैसै राष्ट्रभाषा है,
नही दिव्यांग मन के सुनलो,मंजिल की अभिलाषा है।
रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
मन के हम है सच्चे सुंदर,अपनी मीठी भाषा है,
नही दिव्यांग मन के सुनलो,मंजिल की अभिलाषा है।
नेक कर्म करने की चाहत,सदा जोश हम रखते है,
नही किसी के पाँव मगर हम,मन से नित हम चलते है
नही कमजोर हाथ नही जो,मन अपनी परिभाषा है,
नही दिव्यांग मन के सुनलो,मंजिल की अभिलाषा है।
भेदभाव को दूर भगाये,सच्चे मन को पहचाने,
मानवता के पथ पर चलना,कर्म समझ अपना जाने,
समता का नित भाव धरें सब, जैसै राष्ट्रभाषा है,
नही दिव्यांग मन के सुनलो,मंजिल की अभिलाषा है।
रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
दोहा मुक्तक दीपावली
दोहा मुक्तक लेखन दिवस..
*दीप जले घर आँगना,सुंदर हो त्योहार,*
*द्वेष कपट सब त्याग कर सुखी करें संसार;*
*प्रेम भाव के तेल से जीवन बने उजास,*
*दुख से ना हो सामना फैलै निसदिन प्यार।*
*प्रेम भाव को थाम कर नव भरदें उल्लास,*
*दीन दुखी के साथ चल जीतें नव विश्वास;*
*हृदय भाव से जो करे दीप दान का काज,*
*ऐसी हो नित आराधना कोई हो न उदास।*
*मात पिता के पाँव को समझें अपना धर्म,*
*भाई बहन का साथ दें समझे अपना कर्म,*
*हृदय से स्वीकार लें सत्य नेक पथ राह,*
*दुखियों की पीड़ा हरें जानें उनका मर्म।*
रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
*दीप जले घर आँगना,सुंदर हो त्योहार,*
*द्वेष कपट सब त्याग कर सुखी करें संसार;*
*प्रेम भाव के तेल से जीवन बने उजास,*
*दुख से ना हो सामना फैलै निसदिन प्यार।*
*प्रेम भाव को थाम कर नव भरदें उल्लास,*
*दीन दुखी के साथ चल जीतें नव विश्वास;*
*हृदय भाव से जो करे दीप दान का काज,*
*ऐसी हो नित आराधना कोई हो न उदास।*
*मात पिता के पाँव को समझें अपना धर्म,*
*भाई बहन का साथ दें समझे अपना कर्म,*
*हृदय से स्वीकार लें सत्य नेक पथ राह,*
*दुखियों की पीड़ा हरें जानें उनका मर्म।*
रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
दोहा मुक्तक- माँ सरस्वती
दोहा मुक्तक छंद - श्रीमती आशा आजाद
हे दाई सुन सरस्वती,इही मोर गोहार,
नारी के दुख देख के,अब ले तँय अवतार,
विपदा अब्बड़ छाय हे,दाव मा लगगे लाज,
रोवत बिलखत आज सुन,नारी अत्याचार।
महिमा कतका गाव ओ,विद्या दाई तोर,
मनखे भूलिन मान ला,नता देय सब टोर,
जम्मो पीरा देख के,बइठे चुप्पे आज,
कलजुग के ए पाप ला,अब तँय कर संहार।
तँय देवी अस देख ले,नारी कतका रोय,
ज्ञान जोत ला बार दे,पाप कभू झन होय,
मनखे हिरदे ज्ञान भर,दे सुग्घर तँय सीख,
नारी के सबले बड़े,लाज कभू झन खोय,
अंधकार बगरे हवय,लुटत हवे सम्मान,
तँय वीणावरदायिनी,नर मा भरदे ज्ञान,
नारी अब कतका सहे,कोन जलाये जोत,
भर दे शक्ति हाथ मा,अतके दे वरदान।
छंदकार - श्रीमती आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
हे दाई सुन सरस्वती,इही मोर गोहार,
नारी के दुख देख के,अब ले तँय अवतार,
विपदा अब्बड़ छाय हे,दाव मा लगगे लाज,
रोवत बिलखत आज सुन,नारी अत्याचार।
महिमा कतका गाव ओ,विद्या दाई तोर,
मनखे भूलिन मान ला,नता देय सब टोर,
जम्मो पीरा देख के,बइठे चुप्पे आज,
कलजुग के ए पाप ला,अब तँय कर संहार।
तँय देवी अस देख ले,नारी कतका रोय,
ज्ञान जोत ला बार दे,पाप कभू झन होय,
मनखे हिरदे ज्ञान भर,दे सुग्घर तँय सीख,
नारी के सबले बड़े,लाज कभू झन खोय,
अंधकार बगरे हवय,लुटत हवे सम्मान,
तँय वीणावरदायिनी,नर मा भरदे ज्ञान,
नारी अब कतका सहे,कोन जलाये जोत,
भर दे शक्ति हाथ मा,अतके दे वरदान।
छंदकार - श्रीमती आशा आजाद
पता - मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
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