गज़ल-मै किताबें पढ़ा ज्ञान बढ़ता गया
मैं किताबें पढ़ा ज्ञान बढ़ता गया,
चल पड़ा जिस डगर सोच गढ़ता गया ।
देख भारी लगी कुछ किताबें मगर,
ध्यान उसमें धरा ध्येय बनता गया ।
कुछ किताबें बड़ी अल्प हल्की लगी,
ज्ञान चुन चुन नये ख्वाब रचता गया ।
पूर्ण होने लगा चाहिए ज्ञान जो,
डर हृदय पर धरा नित्य मरता गया ।
पूछता फिर रहा प्रश्न मन जो धरा,
कुछ किताबें पढ़ी हल निकलता गया ।
बेवजह है नही ये किताबें सभी,
रोज लिखता गया रोज पढ़ता गया ।
ध्यान थोड़ा धरा सब सरल सा लगा,
श्रेष्ठ इच्छा रखा सोच चलता गया ।
रोज परिश्रम किया आस पूरा हुआ,
आज मंजिल मिली और हँसता गया ।
ज्ञान पाया बहुत ज्ञान बाँटा बहुत,
मित्र है ये शुभम श्रेष्ठ कहता गया ।
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