मुक्तक
पंछी उड़ते नील गगन में, वृक्षों पर उसका डेरा है ।
भटक रहे हैं इधर उधर वे, मानव बन गया लुटेरा है ।
पंछी घटते नित्य भरा पर, यह कैसा कलयुग आया । मानुष फँसता लोभ मोह में, लालच ने सबको घेरा है ।।
तिनका तिनका ढूंढ ढूंढ कर,वह अपना नीड़ बनाती है । नव बच्चे को वहाँ बिठाकर फिर भोजन ढूँढने जाती है । वापस आकर नयन खोजते, दिखे न कहाँ बसेरा है । चींचीं करके फुदक रही है, आँसू माँ नित्य बहाती है ।।
धन का कितना लोभ समाया, वृक्ष काटता जाता है । कोलाहल पक्षियों का घटे, क्यों मानव आंक न पाता है । जंगल घटते आज देख लो, रोती आज नित्य वसुंधरा । पर्यावरण बिगड़ता देखो, मनुज स्वार्थ अपनाता है ।।
वर्तमान मे मोबाइल का, टावर देखो यह है आया ।कामकाज से ज्यादा मानो, खूब मनोरंजन है भाया ।कंपन पंक्षी सह नहिं पाते, गिरकर मरते जाते है ये ।
घर घर कितने है मोबाइल, हमने मिल कहर बहुत ढाया ।।
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