Wednesday, 28 April 2021

चौपाई छंद-आक्सीजन

चौपाई छंद-आक्सीजन कहाँ है


आक्सीजन अब ढूँढ रहे हो।मत काटों क्या पेड़ कहे हो।

वर्तमान में मानुष रोता।लोभ मोह में सबकुछ खोता।।


कलयुग का यह है संदेशा।कभी लगाया नहिं अंदेशा।

प्रतिक्षण मानुष जूझ रहा है।वृक्ष न काटों कभी कहा है।।


जीवन तो बस वृक्ष जहाँ है।आक्सीजन बस मिले वहाँ है।

आज सबक हमको लेना है।वृक्षों को जीवन देना है।।


फैल गया है ये कोरोना।आज पड़े है जीवन खोना।

तड़प तड़प कर मरते सारे।आज वायरस सबको मारे।।


कैसे मानव जीव बचाए।आक्सीजन कैसे नित लाए।

व्याकुल होकर तड़पे भारी।वर्तमान की ये लाचारी।।


कलयुग में यह संकट आया।कोरोना जन को तड़पाया।

आक्सीजन पैसो में बिकता।बिन इसके कोई न टिकता।।


प्रकृति देख चुपचाप खड़ी है।मनुज काल की विषम घड़ी है।

अब पछताए कुछ नही होता।फल वैसा पाए जो बोता।।


वृक्ष लगाना ध्येय बनाएँ।जन जन को यह बात बताएँ।

शुद्ध वायु है एक अधारा।इसे बचाना लक्ष्य हमारा।।


Wednesday, 21 April 2021

गीत-कोरोना

गज़ल

मै किताबें पढ़ा ज्ञान बढ़ता गया


मैं किताबें पढ़ा ज्ञान बढ़ता गया,

चल पड़ा जिस डगर सोच गढ़ता गया ।


देख भारी लगी कुछ किताबें मगर,

ध्यान उसमें धरा ध्येय बनता गया ।


कुछ किताबें बड़ी अल्प हल्की लगी,

ज्ञान चुन चुन नये ख्वाब रचता गया ।


पूर्ण होने लगा चाहिए ज्ञान जो,

डर हृदय पर धरा नित्य मरता गया ।


पूछता फिर रहा प्रश्न मन जो धरा,

कुछ किताबें पढ़ी हल निकलता गया ।


बेवजह है नही ये किताबें सभी,

रोज लिखता गया रोज पढ़ता गया ।


ध्यान थोड़ा धरा सब सरल सा लगा,

श्रेष्ठ इच्छा रखा सोच चलता गया ।


रोज परिश्रम किया आस पूरा हुआ,

आज मंजिल मिली और हँसता गया ।


ज्ञान पाया बहुत ज्ञान बाँटा बहुत,

मित्र है ये शुभम श्रेष्ठ कहता गया ।




गीत-चलता गया

गज़ल

मै किताबें पढ़ा ज्ञान बढ़ता गया


मैं किताबें पढ़ा ज्ञान बढ़ता गया,

चल पड़ा जिस डगर सोच गढ़ता गया ।


देख भारी लगी कुछ किताबें मगर,

ध्यान उसमें धरा ध्येय बनता गया ।


कुछ किताबें बड़ी अल्प हल्की लगी,

ज्ञान चुन चुन नये ख्वाब रचता गया ।


पूर्ण होने लगा चाहिए ज्ञान जो,

डर हृदय पर धरा नित्य मरता गया ।


पूछता फिर रहा प्रश्न मन जो धरा,

कुछ किताबें पढ़ी हल निकलता गया ।


बेवजह है नही ये किताबें सभी,

रोज लिखता गया रोज पढ़ता गया ।


ध्यान थोड़ा धरा सब सरल सा लगा,

श्रेष्ठ इच्छा रखा सोच चलता गया ।


रोज परिश्रम किया आस पूरा हुआ,

आज मंजिल मिली और हँसता गया ।


ज्ञान पाया बहुत ज्ञान बाँटा बहुत,

मित्र है ये शुभम श्रेष्ठ कहता गया ।




गज़ल

गज़ल

मै किताबें पढ़ा ज्ञान बढ़ता गया


मैं किताबें पढ़ा ज्ञान बढ़ता गया,

चल पड़ा जिस डगर सोच गढ़ता गया ।


देख भारी लगी कुछ किताबें मगर,

ध्यान उसमें धरा ध्येय बनता गया ।


कुछ किताबें बड़ी अल्प हल्की लगी,

ज्ञान चुन चुन नये ख्वाब रचता गया ।


पूर्ण होने लगा चाहिए ज्ञान जो,

डर हृदय पर धरा नित्य मरता गया ।


पूछता फिर रहा प्रश्न मन जो धरा,

कुछ किताबें पढ़ी हल निकलता गया ।


बेवजह है नही ये किताबें सभी,

रोज लिखता गया रोज पढ़ता गया ।


ध्यान थोड़ा धरा सब सरल सा लगा,

श्रेष्ठ इच्छा रखा सोच चलता गया ।


रोज परिश्रम किया आस पूरा हुआ,

आज मंजिल मिली और हँसता गया ।


ज्ञान पाया बहुत ज्ञान बाँटा बहुत,

मित्र है ये शुभम श्रेष्ठ कहता गया ।




गज़ल

गज़ल-मै किताबें पढ़ा ज्ञान बढ़ता गया


मैं किताबें पढ़ा ज्ञान बढ़ता गया,

चल पड़ा जिस डगर सोच गढ़ता गया ।


देख भारी लगी कुछ किताबें मगर,

ध्यान उसमें धरा ध्येय बनता गया ।


कुछ किताबें बड़ी अल्प हल्की लगी,

ज्ञान चुन चुन नये ख्वाब रचता गया ।


पूर्ण होने लगा चाहिए ज्ञान जो,

डर हृदय पर धरा नित्य मरता गया ।


पूछता फिर रहा प्रश्न मन जो धरा,

कुछ किताबें पढ़ी हल निकलता गया ।


बेवजह है नही ये किताबें सभी,

रोज लिखता गया रोज पढ़ता गया ।


ध्यान थोड़ा धरा सब सरल सा लगा,

श्रेष्ठ इच्छा रखा सोच चलता गया ।


रोज परिश्रम किया आस पूरा हुआ,

आज मंजिल मिली और हँसता गया ।


ज्ञान पाया बहुत ज्ञान बाँटा बहुत,

मित्र है ये शुभम श्रेष्ठ कहता गया ।