Wednesday, 21 April 2021

गीत-चलता गया

गज़ल

मै किताबें पढ़ा ज्ञान बढ़ता गया


मैं किताबें पढ़ा ज्ञान बढ़ता गया,

चल पड़ा जिस डगर सोच गढ़ता गया ।


देख भारी लगी कुछ किताबें मगर,

ध्यान उसमें धरा ध्येय बनता गया ।


कुछ किताबें बड़ी अल्प हल्की लगी,

ज्ञान चुन चुन नये ख्वाब रचता गया ।


पूर्ण होने लगा चाहिए ज्ञान जो,

डर हृदय पर धरा नित्य मरता गया ।


पूछता फिर रहा प्रश्न मन जो धरा,

कुछ किताबें पढ़ी हल निकलता गया ।


बेवजह है नही ये किताबें सभी,

रोज लिखता गया रोज पढ़ता गया ।


ध्यान थोड़ा धरा सब सरल सा लगा,

श्रेष्ठ इच्छा रखा सोच चलता गया ।


रोज परिश्रम किया आस पूरा हुआ,

आज मंजिल मिली और हँसता गया ।


ज्ञान पाया बहुत ज्ञान बाँटा बहुत,

मित्र है ये शुभम श्रेष्ठ कहता गया ।




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