Tuesday, 9 February 2021

मुक्तक-पक्षियों की पीड़ा

मुक्तक


पंछी उड़ते नील गगन में, वृक्षों पर उसका डेरा है ।

भटक रहे हैं इधर उधर वे, मानव बन गया लुटेरा है ।

पंछी घटते नित्य भरा पर, यह कैसा कलयुग आया । मानुष फँसता लोभ मोह में, लालच ने सबको घेरा है ।।

तिनका तिनका ढूंढ ढूंढ कर,वह अपना नीड़ बनाती है । नव बच्चे को वहाँ बिठाकर फिर भोजन ढूँढने जाती है । वापस आकर नयन खोजते, दिखे न कहाँ बसेरा है ।  चींचीं करके फुदक रही है, आँसू माँ नित्य बहाती है ।।

धन का कितना लोभ समाया, वृक्ष काटता जाता है । कोलाहल पक्षियों का घटे, क्यों मानव आंक न पाता है । जंगल घटते आज देख लो, रोती आज नित्य वसुंधरा । पर्यावरण बिगड़ता देखो, मनुज स्वार्थ अपनाता है ।।

वर्तमान मे मोबाइल का, टावर देखो यह है आया ।कामकाज से ज्यादा मानो, खूब मनोरंजन है भाया ।कंपन पंक्षी सह नहिं पाते, गिरकर मरते जाते है ये ।

घर घर कितने है मोबाइल, हमने मिल कहर बहुत ढाया ।।



लोकसदन प्रत्रिका में प्रकाशित

लोकसदन पत्रिका में प्रकाशित रचनाएँ

सरसी छंद-नन्ही सी चिड़िया

सरसी छंद- मैं हूँ नन्हीं सी चिड़िया


मैं हूँ नन्हीं सुंदर चिड़िया, वृक्ष एक आधार ।

मनुज छीनता आज देखलो, नित मेरा घर बार ।।


जब-जब नीड़ बनाती हूँ मैं, घर जाता है टूट ।

धन का लालच हृदय बसाकर, चैन रहें है लूट ।।


पीड़ा मुझको भी होती है, समझो मेरा मर्म ।

मूक सदा रहकर भी सुनलो, सदा निभाती धर्म ।।


घर की चाहत जैसा रखते, वैसी मुझको आस ।

वृक्ष काटकर छींन रहे क्यों, मुझसे मेरा वास ।।


आँखों में आसूँ नहिं पर,हृदय बहुत है रोय ।

सुंदर जन्में मेरे बच्चे, मुझसे अब है खोय ।।


मानुष स्वार्थी रूप धरा है, पल पल बढ़ता लोभ ।

वृक्ष काटता जाता है वो, तनिक करे नहिं क्षोभ ।।


उड़ते थे हम पंख पसारे, आसमान पर रोज ।

वर्तमान में नहीं मिलेंगे, करलें कितनी खोज ।।


पंछी के मन की पीड़ा को, समझो मनुज सुजान ।

वरना कल को रोगी बनकर, पहुँचोगे शमशान ।।


आशा आजाद"कृति"