सरसी छंद- मैं हूँ नन्हीं सी चिड़िया
मैं हूँ नन्हीं सुंदर चिड़िया, वृक्ष एक आधार ।
मनुज छीनता आज देखलो, नित मेरा घर बार ।।
जब-जब नीड़ बनाती हूँ मैं, घर जाता है टूट ।
धन का लालच हृदय बसाकर, चैन रहें है लूट ।।
पीड़ा मुझको भी होती है, समझो मेरा मर्म ।
मूक सदा रहकर भी सुनलो, सदा निभाती धर्म ।।
घर की चाहत जैसा रखते, वैसी मुझको आस ।
वृक्ष काटकर छींन रहे क्यों, मुझसे मेरा वास ।।
आँखों में आसूँ नहिं पर,हृदय बहुत है रोय ।
सुंदर जन्में मेरे बच्चे, मुझसे अब है खोय ।।
मानुष स्वार्थी रूप धरा है, पल पल बढ़ता लोभ ।
वृक्ष काटता जाता है वो, तनिक करे नहिं क्षोभ ।।
उड़ते थे हम पंख पसारे, आसमान पर रोज ।
वर्तमान में नहीं मिलेंगे, करलें कितनी खोज ।।
पंछी के मन की पीड़ा को, समझो मनुज सुजान ।
वरना कल को रोगी बनकर, पहुँचोगे शमशान ।।
आशा आजाद"कृति"
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