Tuesday, 9 February 2021

सरसी छंद-नन्ही सी चिड़िया

सरसी छंद- मैं हूँ नन्हीं सी चिड़िया


मैं हूँ नन्हीं सुंदर चिड़िया, वृक्ष एक आधार ।

मनुज छीनता आज देखलो, नित मेरा घर बार ।।


जब-जब नीड़ बनाती हूँ मैं, घर जाता है टूट ।

धन का लालच हृदय बसाकर, चैन रहें है लूट ।।


पीड़ा मुझको भी होती है, समझो मेरा मर्म ।

मूक सदा रहकर भी सुनलो, सदा निभाती धर्म ।।


घर की चाहत जैसा रखते, वैसी मुझको आस ।

वृक्ष काटकर छींन रहे क्यों, मुझसे मेरा वास ।।


आँखों में आसूँ नहिं पर,हृदय बहुत है रोय ।

सुंदर जन्में मेरे बच्चे, मुझसे अब है खोय ।।


मानुष स्वार्थी रूप धरा है, पल पल बढ़ता लोभ ।

वृक्ष काटता जाता है वो, तनिक करे नहिं क्षोभ ।।


उड़ते थे हम पंख पसारे, आसमान पर रोज ।

वर्तमान में नहीं मिलेंगे, करलें कितनी खोज ।।


पंछी के मन की पीड़ा को, समझो मनुज सुजान ।

वरना कल को रोगी बनकर, पहुँचोगे शमशान ।।


आशा आजाद"कृति"


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