Monday, 3 August 2020

लोकसदन मे प्रकाशित रचनाएँ

आशा की अमृत वाणी

मुक्तक

करुणा की है मूर्ति धरा पर,सुंदर रखती ज्ञान,
तन पर कितनी पीड़ा सहती,देती जीवन दान,
कर्म धर्म से मुख नहिं मोड़ा,होवें कितने भार,
कलयुग में बस एकमात्र है,माँ दे स्नेह समान।

दोहवली-स्वच्छता

राह स्वच्छता की रहे,सभी बढ़ाए हाथ।
रोग मुक्त भारत बने,मिलजुल देवें साथ।।

नित्य प्रदूषण बढ़ रहा,बीमारी से ग्रस्त।
कचरा कूड़ा फेंकते,मनुज स्वयं में मस्त।।

साफ सफाई नित्य हो,रखें आप ही ध्यान।
पालिथीन से हानि है,नित्य बाँटदें ज्ञान।।

भारतवासी आप ही,तन को स्वस्थ बनाय।
शुद्ध वायु से तन सभी,रोग मुक्त हो जाय।।

चाह अगर सुंदर जीवन का, चलो गाँव की ओर।
चीं चीं करके गीत सुनाती,चिड़ियों का हो शोर।

कलकल बहती नदियाँ सुंदर,सुनलों सुंदर राग।
हरी वादियाँ हृदय लुभाती,सुंदर होली फाग।

कभी प्रदूषण नही घेरता,उठकर देखो भोर।
हरियाली चहुँओर है फैली, मन मारे हिलकोर।
छप्पय छंद-तुलसीदास

तुलसीदास महान,महाकवि है कहलाते।
दोहा देकर श्रेष्ठ,हृदय में स्थान बनाते।
जनहित ज्ञान अपार,श्रेष्ठ कविराज कहाये ।
बने साहित्य स्त्रोत,मार्ग सुंदर दिखलाये।
रामचरितमानस रचा,भक्तिभाव के धार से।
बने प्रेरणा दीप ये,अपने सुंदर भाव से।।

दोहावली -उजास मन

मानव हृदय उजास रख,करलें सुंदर काम।
नेक कर्म औ भाव से,मिलता जग में नाम।।

नित्य उजाला ज्ञान का,जन-जन में संचार।
मृदु वाणी को बोल से,सुंदर दे व्यवहार।।

भाव सर्मपण का धरें,कलुषित होय न कर्म।
मानव हृदय उजास हो,एक रहे सब धर्म।।

सभी मिटादे रंज अब,हो चहुँओर प्रकाश।
भारत के उत्थान में,आलस का हो नाश।।

छप्पय छंद-गैंगस्टर है नाग

गैंगस्टर है नाग,देशद्रोही है सारे।
डसते बनकर रोज,मनुज के ये हत्यारे।
बेकसूर की जान,न जाने क्यों है लेते।
देश प्रेम का भाव,त्याग मन से है देते।
भारत माता रो रही,गैंगस्टर आतंक से।
आम मनुज भयभीत है,क्रूरता के डंक से।।

कुकुभ छंद-सतर्कता का ध्यान धरें

अंतस मन से प्रण ये करलें,जड़ से रोग मिटाएगें।
अनुशासित रहकर हम सारे,रिश्तें सभी निभाएगें।

करना दृणसंकल्प हमें ये,हम ही भारतवासी है।
हर मुश्किल से लड़ जाते है,हम ही मथुरा कासी है।।

घर परिवार सुरक्षित होगा,तब ही ये जग भाएगा।
अनुशासन के पालन से ही,नवपरिवर्तन आएगा।


सरसी छंद- नीर उपहार

वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।
भूले से भी कभी न बिगड़े,धरती का श्रृंगार।।

छिपा हुआ भूगर्भ सहत पर,भूजल का भंडार।
शुद्ध रुप में बहे निरंतर,इससे ही संसार।।

व्यर्थ कभी मत इसे गँवाना,सुनो नीर उपहार।
वंसुधरा पर सुंदर जीवन,है अपना आधार।।

चौपाई छंद-मेरा सुंदर गाँव

मेरा सुंदर गाँव निराला।हर्षित मन को करने वाला।
शुद्ध हवा जो निसदिन आये।तन मन को सब शुद्ध बनाये।।

पंक्षी मधुरिम गीत सुनाते।चीं चीं करके हृदय लुभाते।
निर्मल वातावरण लुभाता।सेहत सबके मन को भाता।।

नही प्रदूषण वहाँ सताता।मानुष सुंदर देह बनाता।
सदा मेहनतकश वो होता।बहुत भार वह निसदिन ढोता।।

सृजन आत्म मंथन जब होगा,
            अंधकार फिर मिटेंगे सभी।
ज्योत प्रेरणा की जागेगी,
             द्वेष पनप न पाएगा कभी।
मिथ्या सूचक संदेश न हो,
              सुंदर नव मंगल गान करें।
काव्य कुंज में कवि मन कुहके,
             सम्मोहित हो रसपान करें।

दोहावली-अशुभ बोलें नही

कभी अशुभ बोलें नहीं,हो जाता आह्वान।
वाणी सुंदर नेक हो,यह ही सच्चा ज्ञान।।

जैसी जिसकी भावना,वैसा ही फल पाय।
अशुभ शब्द से नित्य ही,कटुता बढ़ती जाय।।

स्वयं आप में झाँकिए,कर्म किया क्या नेक।
दीन दुखी के कष्ट हर,पुण्य कमाया एक।।

स्वयं प्रशंसा क्यों करें,त्यागें गर्व गुमान।
मृदुवाणी अनमोल है,सत्य श्रेष्ठ पहचान।।

दोहावली-दाई मोला दे जनम

दाई अपने कोख मा, मोला झन तँय मार ।
सरी जगत मा देखहूँ, लेके मँय अवतार।।

जिनगी मोला दान दे,मँय बेटी वरदान।
भ्रूण नाश हा पाप हे,समता ला तयँ जान।।

अंश हरौं मँय तोर वो,नारी के अवतार।
मोला सुग्घर दे जनम,मोर हवय गोहार।।

कुण्डलिया-ज्ञानार्जन

ज्ञानार्जन है जो किया,शिक्षक करते दान।
भाव धरे निस्वार्थ का,देते निर्मल ज्ञान।
देते निर्मल ज्ञान,शिष्य बनना स्वीकारें।
होगा बुद्धि विकास,मिटे जिज्ञासा सारे।
सत्य गलग का मार्ग,करे वे ही परिमार्जन।
उनका हो उद्धार,करे मन से ज्ञानार्जन।।

कुण्डलिया-कोरोना संकट

संकट की यह आपदा,करता है बेहाल।
बना आज ये देश में,कोरोना नव काल।
कोरोना नव काल, रोग ये कैसा आया।
जन जन पर ये आज,कहर है नित बरपाया।
आशा कहती नेक,धरें तन पर अब कंकट।
अनुशासन का रोक,टाल दे सारे संकट।।

छप्पय छंद-सफाई

भारत सुंदर देश,गंदगी कभी न होवे।
साफ सफाई रोज,
चमचम रखे म सान,आज सबला समझाई।
कूड़ा सबो डलाय,जिहाँ हे कचरा दानी।
देवय जे सहयोग,उही कहरावय ज्ञानी।
परदूषण झन होय जी,इही गोठ मा सार हे।
बड़े बिमारी ले बचौ,सेहत के आधार हे।।
छप्पय छंद-प्रेम भाव

खून खराबा द्वेष,नित्य बढ़ता ही जाता।
रिश्तों अपने आज,मनुज निभा नही पाता।
भाई-भाई के बीच,नही है भाई चारा।
धन का बढ़ता लोभ,बने फिर वह हत्यारा।
क्रोध भाव को त्याग दें,रिश्तें सारे तोड़ता।
प्रेम भाव ही सार है,जो सब रिश्तें जोड़ता।।

छप्पय छंद-कम्प्यूटर के ज्ञान

कम्प्यूटर के ज्ञान,आज अपनावौ भाई।
जम्मो होथे काज,देश के होत भलाई।।
होवै बुद्धि विकास,देश दुनियाँ के शिक्षा।
आनलाइन ग होय,देख लौ आज परीक्षा।।
जन-जन के आधार हा,इही म आज रखाय जी।
सबो आकड़ा काम के,छिन मा सब मिल जाय जी।।

रुप घनाक्षरी-दीन हीन की दशा

दीन हीन की दशा को,समझे न कोई प्राणी,
भूख से ये मर रहे,सह रहे अपमान।
अन्न कहाँ से ये लाएँ,कैसै गरीब मुस्काये।
भर पेट खाना नही,करे नही अभिदान,
धन नही बच पाएँ,रोजी से नही गुजारा,
व्याकुल गरीब सारे,नही लेता कोई भान।
तिल तिल मरते है,पीड़ा नित्य सहते है,
भारत की गरीबी का,रखें कुछ तो संज्ञान।
लालच

झूठ लबारी गोठ ला ,मनखे मन गठियाय।
लालच पइसा के करे,सत ला नइ ता भाय।।
सत ला नइ ता भाय,असत के रद्दा धरथे।
हावय लोभ अपार,रात दिन लोभ म मरथे।।
जाना खाली हाथ,जगत ले आही पारी।
अब ता मनखे चेत ,छोड़ दे झूठ लबारी।।

अमृतध्वनि छंद

मिलता सेहत योग से,कहते है सब संत,
भोर भये शुभ काल में,बीमारी का अंत,
बीमारी का -अंत हृदय को,निर्मल रखता,
शुद्ध श्वास से,शुद्ध रक्त नित,तन पर बहता,
आशा कहती,योग ध्यान से,मिटे शिथिलता।
योगा से ही,तन को अपने,सेहत मिलता।

व्यर्थ खर्च

चादर छोटी पड़ रही,किया खर्च जो व्यर्थ,
मनुज भूलता जा रहा,जीवन का क्या अर्थ।
जीवन का क्या-अर्थ लोभ से,कुछ नहिं हासिल,
सदा संतोष,हृदय भाव में,होवे सामिल।
आशा कहती,जीवन का सब,करलें आदर,
खर्च करे सब,उतना जितनी,होवे चादर।

कुण्डलिया-शिक्षक

शिक्षक तो अभिमान है,यही जगत की शान,
ज्ञान दान से तृप्त कर,गढ़ते नव इंसान।
गढ़ते नव इंसान,ज्ञान की वर्षा करते,
देते सुंदर सार,सत्य को मन में भरते।
आशा कहती नेक,जगत के सच्चे दीक्षक,
सत्य कर्म की राह,मार्ग दिखलाते शिक्षक।।

मन से ईष्या त्याग दें,चुनें कर्म आधार,
क्षण भर की है जिंदगी,बने संतोष सार।
बने संतोष सार, हृदय से लालच त्यागें,
कर देता है नष्ट,सोचकर मानुष जागें।
आशा कहती नेक,कर्म को करे लगन से,
अहम भाव हो खत्म,मिटाए अपने मन से।

मृदुवाणी और मधुरता से,
           कलम सदैव ही सुगंधित हो।
निर्मलता हो और गहनता,
        सृजन करें वह भी साधित हो।
ज्ञान संचार हो लेखन में,
        जनहित का सब उत्थान करें।
काव्य कुंज में कवि मन कुहके,
           सम्मोहित हो रसपान करें।

मुक्तक-प्रेम भाव

प्रेम भाव को थाम कर,भरदें नव उल्लास।
दीन दुखी के साथ चल,जीतें नव विश्वास।।
हृदय भाव से जो करे,अन्न दान का काज।
होवें सुखी गरीब जन,कोई न हो उदास।।


मनहरण घनाक्षरी छंद

छत्तीसगढ़ ला मानौ,धन के भंडार जानौ।
कलकल नदियाँ हा,सुघर बोहात हे।
कौशल नाव धरायें,माटी बड़ ममहायें,
हरिहर धान पान,अबड़ सोहात हे।
खनिज भंडार भरे,बेलाडिला लोहा धरे,
सुघर पहाड़ी मैना,मीठ गीत गात हे।
पंथी नाचा खूब भावै,सुवा गीत बड़ गावै,
भुइँया महतारी के,सुघर सौगात हे।
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मनहरण घनाक्षरी छंद-माँ

हृदय भाव माँगती है,सबको वो चाहती है,
माँ कहलाती है वो,नेक वरदान है।
नेक कर्म करती है,प्रेम भाव रखती है,
देवी वह कहलाती,धरती की मान है।
निभाती है जिम्मेदारी,जग की है अवतारी,
सुरक्षा दे कोख में वो,जन्म सम्मान है।
आशा वाणी कहती है,शीश को सभी झुकाओ,
दुख सुख माँ निभाये,धरती की शान है।।

अमृतध्वनि छंद
यातायात के नियम

जीवन तो अनमोल है,जीवन के दिन चार।
है जो यातायात के,पढ़ें नियम का सार।।
पढ़ें नियम का-सार सभी फिर,पालन करलें।
दुर्घटना से,सदा बचे सब,सोच समझ लें।।
आशा कहती,ध्यान धरें सब,छोड़े खीवन।
गाँठ बाँध ले,जीना हमको,उत्तम जीवन।।

अमृत दोहे

हमें बुजुर्गो का सदा,करना है सम्मान।
हृदय भाव से खुश रहें,भरदें नव मुस्कान।।

जीवन को सुंदर किया,दिया नेक अभिदान
सुखमय जीवन जी रहे,हम इनकी संतान।।

प्रेम अपनत्व बाँट कर,दें सुंदर संदेश।
पूजनीय है ये सदा,जग के यही जनेश।।
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बुरे कृत्य को छोड़ कर,लाएँ सुंदर भाव।
मानवता की राह पर,कभी न हो ठहराव।।

पुलकित मन सबका करें,भरदे नव उल्लास।
भारत का हर नागरिग,धरें आप विश्वास।।

नित्य उजाला ज्ञान का,जन-जन में संचार।
मृदु वाणी सुंदर रहे,सुंदर हो व्यवहार।।
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दाई अपने कोख मा, मोला झन तँय मार ।
सरी जगत मा देखहूँ, लेके मँय अवतार।।

अंश हरौं मँय तोर वो,नारी के अवतार।
मोला सुग्घर दे जनम,मोर हवय गोहार।।

जिनगी मोला दान दे,मँय बेटी वरदान।
भ्रूण नाश हा पाप हे,समता ला तँय जान।।
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इस धरती पर देव है,अपने सभी किसान।
उपजाते है अन्न को,सबके ये भगवान।।

आज दुर्दशा देखलें,नित्य बहाते नीर।
आय नही है क्या करें,कितना सहते पीर।।

करते मेहनत रोज ये,कितना सहते धूप।
कितना सहते कष्ट ये,इनका कार्य अनूप।।

नही गुजारा आज तो,रोता है परिवार।
वंचित है सब लाभ से,सुने नही सरकार।।

फाँसी पर है झूलते,बढ़ता जाता कर्ज।
सुने नही सरकार ये,नही निभाती फर्ज।।
अमृतध्वनि छंद

पीना गाँजा छोड़ दे,तन करता कमजोर।
धीरे धीरे श्वास की,नित्य तोड़ता डोर।
नित्य तोड़ता-डोर हृदय गति,तेज बढ़ाता।
नशा लगाके,कर्म धर्म को,निभा न पाता।
आशा कहती,तुझको घुटकर ,क्यो है जीना।
नाश करे है,गाँजा सुनले ,कभी न पीना।।

मानव काटे पेड़ को,बढ़ता नित्य धूमाभ।
पर्यावरण बिगाड़ते,रखकर थोड़ा लाभ।
रखकर थोड़ा-लाभ लोभ में,है फँस जाते।
बिगड़ रहे है,आज हालात,समझ न पाते।
आशा कहती,वृक्ष लगाना,प्रण हो अभिनव।
नित्य घटेगा,आज प्रदूषण ,समझें मानव।।

माता जीवन है अगर,पिता प्रेम आधार।
कठिन डगर भी सरल हो,अनुपम उनका प्यार।
अनुपम उनका-प्यार ज्ञान से ,जीवन गढ़ते।
सत्य मार्ग की,शिक्षा से नित,बच्चे बढ़ते।
आशा कहती,इस धरती पर,यही विधाता।
प्रेम पिता है,जन्म दायिनी,सबकी माता।।



गाँधी जी के बेंदरा,सत ला कहिथे जान।
सुग्घर गुत्तुर बोल लव,बानी बड़खा मान।
बानी बड़खा -मान इही हा,काम ग आही
गारी देबे,झूठ बोलबे,मान घटाही।
आशा कहिथे,कान बंद कर,सत ला बाँधी।
छोड़ झूठ ला,इही बचन ला,बोलिस गाँधी।।

मुझको पापा देखना,सारा ये संसार।
नारी का हूँ अंश मैं,जान मुझें नहिं मार।
जान मुझें नहिं-मार कोख में,बैठी माँ के।
हृदय भाव से,मुझे तार दे,तू अपनाके।
आशा कहती,सब खुशियाँ मैं,दूँगी तुझको।
भ्रूण नाश का,भाव त्याग कर,लाना मुझको।।

कलयुग का मानुष बुरा,देख खड़ा है मौन।
लुटती बाला रो रही,न्याय दिलाए कौन।
न्याय दिलाए-कौन लाज है,खोती नारी।
दुष्ट सोच से,नही रही अब,वो अवतारी।
आशा कहती,आज रहा नहिं,ये भावानुग।
सिसक रही है,सुने न कोई,है ये कलयुग।।

बढ़ता है राजस्व का,मदिरा से ही कोष।
हर जन का सरकार से,बढ़ता जाता रोष।
बढ़ता जाता-रोष करें क्या,ये नादानी।
मदिरालय को,खोल रहे है,क्यों अज्ञानी।
आशा कहती,कोरोना से,मानुष लड़ता।
मदिरालय से,पीने का नित,लत है बढ़ता।।

भूजल घटता जा रहा,लोग न देते ध्यान।
खर्च करें है जल अधिक,रखते नहिं यह ज्ञान।
रखते नहिं यह-ज्ञान नीर है,हमें बचाना।
रखें बचाकर,त्यागें जल को,व्यर्थ गँवाना।
आशा कहती,जिम्मेदारी,समझें प्रतिपल।
वर्षा का जल,नित्य निरंतर,पहुँचे भूजल।।

कलयुग का यह हाल है,अपने रखते बैर।
भाई भाई लड़ रहे,पूछें कभी न खैर।
पूछें कभी न-खैर द्वेष नित,पनप रहा है।
लोभ मोह में,मानुष कितना,धधक रहा है।
आशा कहती,बिसर रहा है,अब भावानुग।
खून खराबा,बढ़ता जाता,ये है कलयुग।।

करुणा की मूरत कहे,जगती का अवतार।
निश्छल ममता नित बहे,अनुपम उनका प्यार।
अनुपम उसका-प्यार जगत की,पालनहारी।
जन्म दायिनी,इस धरती पर,है अवतारी।
आशा कहती,प्रेम बाँटती,जैसे अरुणा।
माँ के आँचल ,सदा विराजे ,ममता करुणा।।

पारस जैसा मन धरे,नेक बने इंसान।
रखते निर्मल ज्ञान जो,करते उसका दान।
करते उसका-दान वही जो,सच्चे होते।
अहम भाव में,ध्यान धरे वे,सबकुछ खोते।
आशा कहती,ग्रहण करें सब,त्यागें आलस।
ज्ञान बाँटकर ,पुण्य कमायें,जैसै पारस।।

करुणा की मूरत कहे,जगती का अवतार।
निश्छल ममता नित बहे,अनुपम उनका प्यार।
अनुपम उसका-प्यार जगत की,पालनहारी।
जन्म दायिनी,इस धरती पर,है अवतारी।
आशा कहती,प्रेम बाँटती,जैसे अरुणा।
क्रोध भाव को,शिथिल करे वो,माँ की करुणा।।

काटें कभी न वृक्ष को,यही हमारी शान।
जीवन सबको दे रही,नित्य बचाती जान।
नित्य बचाती-जान हमारी,कुछ नहिं लेती।
शुद्ध श्वास को,नित्य फेफड़ों,में भर देती।
आशा कहती,वृक्ष बचायें,शिक्षा बाटें।।
छाँव हमेशा,देगी हमको,वृक्ष न काटे।।

मंजिल पाना है अगर,साथ रखें सब लक्ष्य।
अंतस हृदय उतार लें,ज्ञानी का जो कथ्य।
ज्ञानी का जो-कथ्य सार से,ज्ञान बढ़ायें।
सदा गहनता,केंद्र बिंदु पर,ध्यान लगायें।
आशा कहती,तब जीवन में,सब हो हाँसिल।
कर्म भाव से,सदा मिलेगी,सबको मंजिल।।

काटव झन जी रुख रई,एहा हावय सान।
जिनगी सबला देत हे,इही बचावय प्रान।
इही बचावय-प्रान हमर जी,बचँय परानी।
जिनगी देथे,खूब बरसथे,झमझम पानी।
आशा कहिथे,पेड़ लगाके,पानी डालव।
देही छइहाँ,सुघर राखँही,रुख झन काटव।।

पारस होती बेटियाँ,इनसे घर संसार।
विश्व धरा की सार है,बाँटे निश्छल प्यार।
बाँटे निश्छल-प्यार सभी को,बाँधे रखती।
रिश्ते नाते,सदा निभाती,दुख सब सहती।
आशा कहती,बेटी सबको,देती साहस।
सदा रही है,सदा रहेगी,बेटी पारस।।

दानी बनके देख ले,सुग्घर करले काम।
रक्तदान मा पुन कमा,जग मा होही नाम।
जग मा होही-नाम मनुज के,जान बचाबे।
जिनगी गढ़बे,दीन दुखी के,काज बनाबे।
आशा कहिथे,तँय कहिलाबे,बड़खा ज्ञानी।
देबे जिनगी,सुख ला पाबे,बनके दानी।।

अनपढ़ रहना नहिं हमें,जब जागो तब भोर।
शिक्षा पाना ध्येय हो,बढ़ें ज्ञान की ओर।
बढ़ें ज्ञान की-ओर मिटेगा,सब अँधियारा।
सभी श्रेत्र में,फैलाएगा,नव उजियारा।
आशा कहती,क्यों रहना है,हमको अनगढ़।
ज्ञान कहे ये,रहे न अब तो,कोई अनपढ़।।

दारू गाँजा छोड़ दे ,खुद मा रख विश्वास।
नशा नाश के जड़ हवय,जिनगी झन कर नास।
जिनगी झन कर-नाश सदा दिन-रहिबे बचके।
झगरा मातै,टूट जथे घर,पीके बमके।
आशा कहिथे,सुग्घर सबके,बन ग मयारू।
इही सिखाबे,झन पीयौ गा,कोनो दारू।।

ज्ञानी बनकर देखलें,राह नही आसान।
कठिन साधना से मिले,जग में सुंदर मान।
जग में सुंदर-मान मिले जो,अहम् भुलाएँ।
तुच्छ समझकर,हृदय भाव से,सब अपनाएँ।
आशा कहती,नव पथ चलना,जिसने ठानी।
धीर धरे वें,आगे चलकर,बनते ज्ञानी।

शिक्षा ता अनमोल हे,करथे नित उद्धार।
हिरदे बारय जोत ला,अंतस भरथे सार।
अंतस भरथे -सार अँधेरा,दूर भगावय।
ज्ञान ध्यान ले,जिनगी सबके,श्रेष्ठ बनावय।
आशा कहिथे,गुरु ले लेवौ,सुग्घर दीक्षा।
मान दिलाही,श्रेष्ठ बनाही,सबला शिक्षा।।

रखकर मानवता सभी,नित्य करें आगाज।
प्रेम भाव आधार से,करें देशहित काज।
करें देशहित-काज पुण्य पथ,चुनना हमको।
हम ही सच्चे,भारतवासी,गढ़ना सबको।
आशा कहती,लोग प्रेरणा,लेंगे पथ पर।
धर्म निभाये,हृदय भाव को,निर्मल रखकर।।

ममता निश्छल है बहे,देती जीवन दान,
माँ अनुपम वरदान है,इस जगती की शान,
इस जगती की-शान ज्ञान है,हर क्षण देती,
सेवा करती,माँ बदले में ,कुछ न लेती,
आशा कहती,स्नेह बाँटती,रखती समता,
सुख दुख सहती,निर्मल होती,माँ की ममता।

मन से ईष्या त्याग दें,चुनें कर्म आधार,
क्षण भर की है जिंदगी,बने संतोष सार,
बने संतोष-सार हृदय का,लालच त्यागें,
कर देता है,नष्ट सोच अब,मानुष जागें,
आशा कहती,कर्म सभी को,करे लगन से
सत् पथ थामें,अहम मिटाये,अपने मन से।

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