Friday, 5 June 2020

दोहा मुक्तक

दोहा मुक्तक....

आखिर क्यों...

रोजी रोटी की सदा,सबको रहती आस,
राज्य छोड़ तपते वहाँ,जहाँ न आये रास,
लोभ मोह में फँस रहे,जाते अक्सर दूर,
यहाँ गुजारा अब नही,भूल चले विश्वास।

जन्मभूमि को छोड़कर,जाते ये मजदूर,
दुख पीड़ा को सह रहे,कितने ये मजबूर,
अपने अपने राज्य में,रहकर नित्य कमाय,
यहाँ आवास स्वयं का,चैन मिले भरपूर।

घर से बाहर कष्ट है,बचत कहाँ से होय,
बच्चे अनपड़ हो चले,ध्यान सभी है खोय,
विषम घड़ी जब आय तो,सब जाते है छोड़,
कुछ हासिल होता नही,फिर दुख से सब रोय।

जन्मभूमि पर कर्म हो,राज्य प्रथम आधार,
मजदूरीं अच्छी मिले,चलता घर संसार,
कठिन क्षणों में साथ दे,अपने सारे लोग,
सुख से अपने राज्य में,पाल रहे परिवार।

आखिर क्यों जाना हमें,अपने घर को छोड़,
राज्य प्रबल मजबूत हो,व्यर्थ छोड़ दे होड़,
मजदूरों से देश का,नित्य हुआ उद्धार,
रहकर अपने राज्य में,देश करें बेजोड़।

आशा आजाद
कोरबा छत्तीसगढ़

दोह गज़ल

दोहा गज़ल दिवस

रोजगार तो मिला नही,बने खिलौना लोग।
नेता डूबे लोभ में,उनका है सुख योग।।

पढ़े लिखे अनपड़ हुये,जोत रहे है खेत।
अनपड़ बैठै आज तो,सुख सत्ता का भोग ।।

डिग्री लेकर क्या करें,कहाँ नौकरी आज।
नेता सबको छल रहे,सब धन का संजोग।।

आज *खिलौना* बन गया,आम आदमी जान।
शिक्षा के नव राह पर,मिटा नही यह रोग ।।

पढ़े लिखे जो लोग है,लोकतंत्र से त्रस्त।
रोजगार मिलता नही,नेता करते ढोंग।।

रचनाकार-आशा आजाद

गीत

गीत 

बनी आज अंगूरी पानी,आज नाश का मूल,
कोरोना के रोग काल मे,शासन करता भूल।

बीमारी के बुरे दौर में,जन जन जूझे आज,
मदिरालय का द्वार खोलकर,दें कैसा आगाज,
खाने को है अन्न नही अब,व्यर्थ बढ़े है शूल,
बनी आज अंगूरी पानी,आज नाश का मूलृ

मदिरापान बुरी बला है, करे देह नुकसान,
जनता फिरभी जहर पी रहे,जान सभी अंजान,
झोला धरकर मदिरालय में,सहे धूप का शूल,
बनी आज अंगूरी पानी,आज नाश का मूल।

दरिद्रता फैली है फिरभी,ले नहिं संज्ञान,
असुरक्षित हुआ भविष्य सुनो,रखे कौन अब भान,
मिलकर कविगण सभी चलायें,नेक निरंतर तूल,
बनी आज अंगूरी पानी,आज नाश का मूल।

आशा आजाद
कोरबा छत्तीसगढ़