गीत
पंक्षी उड़ते नील गगन मे,
वृक्षो पर उसका डेरा है।
भटक रहे है इधर उधर वो,
मानव बन गया लुटेरा है।
तिनका तिनका ढूँढ ढ़ूँढ कर,
वह अपना नीड़ बनाती है।
नव बच्चे को वहाँ बिठाकर,
फिर भोजन ढूँढने जाती है।
वापस आकर नयन खोंजतें,
दिखें नही अब कहाँ बसेरा है।
पंक्षी उड़ते नील गगन मे,
वृक्षो पर उसका डेरा है।
इधर उधर वो फुदक कुदक कर,
चीं चीं करती तड़प रही है।
पेड़ कहाँ वो जिसपे मेरा,
नीड़ बना था कहीं नही है।
माँ की आँखो में आसूँ है,
चहुँओर छा गया अँधेरा है।
पंक्षी उड़ते नील गगन में,
वृक्षो पर उसका डेरा है।
लोभ मोह में जलते मानुष,
वृक्ष काटता वो जाता है।
कोलाहल पंक्षियों का घटे,
क्यों वो आँक नही पाता है।
जंगल घटते आज देखलो,
लालच ने सबको घेरा है।
पंक्षी उड़ते नील गगन में,
वृक्षो पर उसका डेरा है।
रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
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