विषय-बिगड़ रही है आज दशाएँ,
अपने भारतवर्ष की।
बिगड़ रही है आज दशाएँ,
अपने भारतवर्ष की।
अपना कौन पराया भूले,
मर्यादा अब मर्ष की।
(1)
रिश्ते नाते भूल रहे है,
मानवता से दूर है।
नन्हीं बेटी तड़प रही है,
वो कितनी मजबूर है।
स्वार्थ भावना पनप रही है,
बाधित पथ उत्कर्ष की।
बिगड़ रही है आज दशाएँ,
अपने भारतवर्ष की।
(2)
दंभ कपट के भरे कृत्य से ,
कलुषित होता आज है।
अनाचार का पाप बढ़ा है,
दोषी जन का राज है।
कहाँ छुपायें मन की पीड़ा,
वर्तमान प्रतिकर्ष की।
बिगड़ रही है आज दशाएँ,
अपने भारतवर्ष की।
(3)
लोभ मोह में जलते नेता,
सत्ता का बस लोभ है।
छलते है जो गरीब जन को,
कभी न होता क्षोभ है।
कलयुग का मानव जहरीला,
नहीं राह संघर्ष की।
बिगड़ रही है आज दशाएँ,
अपने भारत वर्ष की।
रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़
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