Friday, 2 November 2018

कविता-क्या है दीवाली

*🕯क्या है दिवाली🕯*

दिवाली के दिन दस साल की बच्ची,
सिर पर बोझा उठा रही थी।
नाजुक से सिर पर उसके,
कितना भार वो चढ़ा रही थी।
मैनै उससे जाकर पूँछा,
कुछ साहस और हिम्मत से,
पूँछा बिटियाँ..!
तुम स्कूल क्यों नही हो जाती,
आज इस तरह तुम बोझा हो उठाती...!
मिठाई खाओ सहेलियों के साथ खुशियाँ मनाओ।
उसने कहा..
मैं आपको बताती हूँ,
क्यों आज मै बोझा उठाती हूँ।
बचपन से उठ गया माँ बाप का साया,
तबसे देखने को जिंदगी में ये दिन है आया।
और आप दिवाली की बात करते है...!
तो सुनिये.....
शायद मेरी यही है बदनसीबी,
मेरा दोस्त हमसफर है गरीबी।
भूख से बिलखती हूँ पेट रहता है खाली,
जिस दिन दो वक्त की रोटी मिली,
उस दिन होती है मेरी दीवाली।
तब मुझे लगा..
हम घरों में पकवान मिठाईयाँ है खाते,
ये मासूम घर पर भूखे हैं सो जाते।
आतिशबाजी का हम आनंद है उठाते,
मासूम गरीब दीवाली में सुख नही पाते।
तब ये अहसास हुआ,
दिल को ये आभास हुआ।
क्या है दिवाली...!
क्या है दिवाली...!

आशा आजाद...✍
मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़

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