Tuesday, 6 November 2018

आशा के दोहे..सरल सहज भावों में


*बेघर बच्चे*

बेघर बच्चे देख लो,रखलो उनका मान।
इस  दीवाली प्रेम से,सबको दो सम्मान।।

तड़प  रहे  है  भूख से,वस्त्र  फटे  है जान।
दीवाली  की  चाह  ना,ना  कोई   अरमान।।

कितने  अनाथ  होय  है,यह  ना  जाने  कोय।
जन्म देय जीवन नया,फिर क्यों उनको खोय।।

देख  रहे  पकवान  को,लालच  करते रोज।
वीराना घर जान ले,नित भोजन की खोज।।

बिलख रहे यह जान ले,देखें अब हालात।
दीवाली  पर  दें  नया,उनको  भी सौगात।।

जगमग देखें रौशनी,किस्मत कोषे जान।
मात पिता की भूल से,टूटे सब अरमान।।

स्नेह प्रेम के ज्योत से,जीवन करे उजास।
जीवन में सब डाल दे,देेय खुशी उल्लास।

बेघर होना  पाप नही,उनका  ना है दोष।
देय जन्म फिर छोड़ते,उनपर ही ये रोष।।

इस दीवाली दान दो,करना परोपकार।
बेघर बच्चें  जब हसें,वो ही  है उपहार।।

मात पिता की कामना,हर जीवन का चाह।
*आशा* तू भी साथ दे,उनको दे नव राह।।

आशा आजाद....✍
कोरबा छत्तीसगढ़

Friday, 2 November 2018

कविता-क्या है दीवाली

*🕯क्या है दिवाली🕯*

दिवाली के दिन दस साल की बच्ची,
सिर पर बोझा उठा रही थी।
नाजुक से सिर पर उसके,
कितना भार वो चढ़ा रही थी।
मैनै उससे जाकर पूँछा,
कुछ साहस और हिम्मत से,
पूँछा बिटियाँ..!
तुम स्कूल क्यों नही हो जाती,
आज इस तरह तुम बोझा हो उठाती...!
मिठाई खाओ सहेलियों के साथ खुशियाँ मनाओ।
उसने कहा..
मैं आपको बताती हूँ,
क्यों आज मै बोझा उठाती हूँ।
बचपन से उठ गया माँ बाप का साया,
तबसे देखने को जिंदगी में ये दिन है आया।
और आप दिवाली की बात करते है...!
तो सुनिये.....
शायद मेरी यही है बदनसीबी,
मेरा दोस्त हमसफर है गरीबी।
भूख से बिलखती हूँ पेट रहता है खाली,
जिस दिन दो वक्त की रोटी मिली,
उस दिन होती है मेरी दीवाली।
तब मुझे लगा..
हम घरों में पकवान मिठाईयाँ है खाते,
ये मासूम घर पर भूखे हैं सो जाते।
आतिशबाजी का हम आनंद है उठाते,
मासूम गरीब दीवाली में सुख नही पाते।
तब ये अहसास हुआ,
दिल को ये आभास हुआ।
क्या है दिवाली...!
क्या है दिवाली...!

आशा आजाद...✍
मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़